कहते हैं कुम्भकर्ण छः महीने सोता था और छः महीने जगता था। विडम्बना देखिये इस शहर का। जो शहर कभी सोता नहीं उस शहर के बाशिंदे कभी जागते ही नहीं। चारों तरफ लूट मची है। भ्रष्टाचार, अनाचार और कदाचार एवं आपराधिक घटनाओं की भरमार है। फिर भी किसी को अपने से ही फुर्सत नहीं। इस शहर में जगह-जगह भयानक गड्ढे हैं। हर बरसात में कमर तक पानी लग जाता है। पीने के पानी की किल्लत हर गली-नुक्कड़ में है। सड़कों पर सड़े -गले कचरों की दुर्गन्ध से सारा वातावरण प्रदूषित रहता है। ट्रेन हो या बस, धक्के खाने की आदत तो इस शहर की नियति बन चुकी है। लगभग अस्सी लाख लोग मुम्बई की लोकल ट्रेनों में प्रतिदिन 'सैंडविच' बनते हैं तथा दस लोग प्रतिदिन भगवान् को प्यारे हो जाते हैं। औसतन ढाई हज़ार लोग प्रत्येक वर्ष लोकल ट्रेनों से कट कर मौत के शिकार हो जाते हैं। प्रतिदिन दो व्यक्ति रोड एक्सीडेंट में मर जाते हैं। आयकर वसूली का ३३ प्रतिशत, सीमा-शुल्क आय का ६० प्रतिशत तथा उत्पाद-शुल्क राजस्व का ४० प्रतिशत मुम्बई शहर से आता है। लेकिन मूलभूत सुविधाओं के नाम पर यहाँ के निवासियों को क्या मिलता है? मुम्बई की आधी आबादी गन्दी बस्तियों एवं झुग्गियों में रहती है। २०२० तक मुम्बई दुनिया का दूसरा सबसे अधिक आबादी वाला शहर बन जाएगा। क्या हम एक बेहतर शहर, बेहतर बुनियादी सुविधाओं की अपेक्षा कर सकते हैं? ज़रा सोचिये तो।
पहली बार मेरी झड़प अखबार बेचनेवाले यादव से हुई थी। वह अखबार पहुँचाने के दस रूपये मांग रहा था। यह मेरे लिए नया अनुभव था क्योंकि दिल्ली या गुडगाँव में मैंने कभी भी अतिरिक्त शुल्क नहीं दिया था. अन्तोगत्वा यादव को हार माननी पड़ी। जब अपना घर लिया तो फिर वही किचकिच। हद तब हो गयी जब सर्विस चार्ज के नाम पर २५ रूपये की मांग की गयी। खैर, मैंने कभी हार नहीं मानी। अख़बार वाला आज भी मात्र अखबार के ही पैसे लेता है और सेवा शुल्क की बात नहीं करता।
दिल्ली के ऑटो रिक्शावाले तो बदनाम हैं ही। मीटर से नहीं चलते। मुम्बई के ऑटो वाले भी बदमाशी करने लगे हैं। कम दूरी हो तो नहीं जाना। लम्बी दूरी हो तो भी समस्या है। इस मार्ग में बहुत गड्ढे हैं। उस तरफ बहुत ट्रैफिक है। कुछेक स्थानों पर 'शेयर्ड रिक्शा' का चलन है। लेकिन अधिक कमाई के उद्देश्य से तीन सवारियों के स्थान पर पांच लोगों बिठाने का प्रयास किया जाता है। यहाँ क़ानून के ठेकेदार आड़े आ जाते हैं। मसलन, अँधेरी स्टेशन से वीरा देसाई मार्ग तक कभी-कभी तीन-तीन पुलिसवालों को 'प्रसाद' देना पड़ता है। कुछ पुलिसवाले तो खुलेआम पैसे खा लेते हैं। लेकिन कुछ ने इसका सुरक्षित तरीका ढूंढ लिया है। पहले रिक्शेवालों से उनके पेपर्स ले लिए जाते हैं फिर 'प्रसाद' देने के पश्चात उनके पेपर्स लौटा दिए जाते हैं।
मुम्बई के लोगों की उदासीनता का एक और नमूना देखिये। मुम्बई में तक़रीबन ६० लाख लीटर दूध की प्रतिदिन खपत होती है। दिल्ली तथा पुणे में जहाँ अधिकतम खुदरा मूल्य पर ही दूध बेचे जाते हैं मुम्बई, नवी मुम्बई एवं थाणे में दो से तीन रूपये प्रति लीटर अधिक वसूले जाते हैं। आपके पास कोई उपाय नहीं। या तो प्रति लीटर दो-तीन रूपये अधिक दीजिये या रास्ता नापिये। दुःखद यह है कि यह लूट सरकारी तंत्र और आला अधिकारियों की नाक के नीचे हो रहा। सुनने में आया है कि थाणे में दूध-विक्रेताओं ने 'अमूल' दूध बेचने से न केवल मना कर दिया है अपितु उसके क्षेत्र में प्रवेश भी निषेध कर दिया है। प्रतिस्पर्धा के कारण तथा विक्रेताओं के ऐसे रवैये से दूध कम्पनियाँ भी स्वं को असहाय पाती हैं। मदर डेयरी दिल्ली की भांति मुम्बई में भी अपनी इकाई स्थापित करना चाहती है लेकिन महाराष्ट्र सरकार उन्हें इसकी अनुमति नहीं देती, जमीन उपलब्ध नहीं कराती। सरकार और सरकारी तंत्र का यह ग्राहक-विरोधी रवैया समझ से परे तो है ही यहाँ के लोगों की उदासीनता चकरा देता है।
यही समय है जब आम लोग अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागें।
