कहते हैं हर मुसलमान आतंकवादी
नहीं होता लेकिन हर आतंकवादी मुसलमान जरूर होता है. आप, मैं या हम में से
ज्यादातर लोग अमूमन मार- काट और खूनी संघर्ष से दूर ही रहना पसंद करेगें. लेकिन
जिनके साथ जुल्म हुआ हो वो भले ही तैश में आकर दहशतगर्दी करें लेकिन
उन्हें बाद में इसका अफ़सोस भी होता है. कोई भी मुसलमान शौक से आतंकवादी या
दहशतगर्द नहीं बनता. उन्हें परिस्थितियाँ बना देती हैं. ज्यादातर युवा
विशेषकर वो जो दंगो से प्रभावित हैं, जिन्होंने अपना सब कुछ खोया है वे
पूरे सामाजिक तंत्र से बदला लेने की ठान लेते हैं. और यह स्वाभविक भी है.
लेकिन कुछ लोग गरीबी और लाचारी से त्रस्त होकर भी इसे पेशा बना लेते हैं
जैसे मुंबई के २६/११ नरसंहार के महानायक कसाब. कुछ लोग तो शीघ्र से शीघ्र
दौलत और शोहरत की बुलंदियां छूने के लिए शौक से शोर्ट कट के तौर पर इसे
अपनाते हैं, मसलन दाउद इब्राहीम. कारण जो भी हो आप कैसे भी इस निर्मम
आतंकवाद को उचित नहीं ठहरा सकते- चाहे धर्म के नाम पे या व्यक्तिगत वैचारिक
कारणों से. मुझे आश्चर्य तब होता है जब पढ़े लिखे लोग भी इन गतिविधियों
में शरीक होते हैं. मुझे याद है जब ९/११ में वर्ल्ड ट्रेड टॉवर ध्वस्त हुआ
था उस वक़्त मैं जवाहरलाल विश्वविद्द्यालय के एक छात्रावास में यह सब लाईव
टी. वी. में देख रहा था. वहाँ मैंने कुछ बुद्धजीवी मुसलमानों को इतना
उद्द्वेलित होते देखा कि मैं दंग हुए बिना नहीं रह सका. गोया, बुश ने उनके
घरों पर बम गिरा दिया हो. बुश ने बेशक गलत किया हो लेकिन उन मुसलमानों की
प्रतिक्रिया हैरान कर देने वाली रही. कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपने को
भारतीय बाद में पहले मुसलमान समझते हैं. उन्हें अपने देश की समस्याओं से
अधिक पेलिस्तीन की समस्याएं अधिक परेशान करती हैं. उन्हें अपने देश के
लोगों के मरने से ज्यादा गैर-मुल्कों के मुसलमानों की मौतें खासतौर पर
पश्चिमी देशों के हमले में हुई मौतें ज्यादा दुःख देती हैं. किसी भी
निर्दोष व्यक्ति की मौत चाहे वो किसी भी देश या मज़हब का हो, निःसन्देश दुखद
होती है. लेकिन उनका भेदभावपूर्ण रवैया मुझे आतंकित कर देता है. हमारे
पडोसी मुल्कों में भी हिन्दू मारे जाते हैं लेकिन हम उनके लिए तो ग़मी नहीं
मनाते न ही जिहाद करने की बात करते हैं? कश्मीर से पंडितों का सफाया कर
दिया गया, और हम हिन्दुओं ने क्या किया? अफ़सोस. तो क्या हिन्दू कायर होते
हैं? पता नहीं. मुझे तो सद्दाम, ओसामा और गद्दाफी के मृत शवों ने भी कुछ
देर के लिए व्यथित कर दिया था.
भारत में कई दंगें हुए हैं और आगे भी होते रहेंगें. यह मानवीय संघर्ष का सिलसिला हमेशा से चलता चला आ रहा है और आगे भी निः संदेह चलेगा. शुक्र मनाईये कि 'सांप्रदायिक दंगा बिल' अधिनियम नहीं बना अन्यथा सोनिया गांधी की कृपा से भारत में बहुसंख्यक और अधिक असुरक्षित हो जाते. हर दंगे के लिए आखिर आप बहुसंख्यकों को ही कैसे जिम्मेदार ठहरा सकते हैं? निः संदेह मुसलमानों को भारत जैसे धर्म निरपेक्ष देश में बराबरी का अधिकार है. लेकिन क्या उनका रवैया उत्तेजित करने वाला नहीं होता? शायद १९९८ में 'सहारा कप' के दौरान मैंने इलाहाबाद में देखा था कि कैसे सैकड़ों मुसलमानों ने भारत के हारने पर भड़काने वाले अंदाज़ में जश्न मनाया था. मुझे यकीन नहीं हुआ था उन मुसलमानों में इस कदर भारत के प्रति घृणा भरी है. मेरे अपने पूर्वी उत्तर प्रदेश के मऊ क्षेत्र में कुछ मुस्लिम बहुल इलाकों में मुसलमानों का जबरदस्त खौफ है. वहां से कई हिन्दुओं को पलायन करना पडा क्योंकि वे उनके बीच असुरक्षित महसूस करते थे. उन्हें अपने हिन्दू पर्व मनाने की अनौपचारिक रूप से अनुमति नहीं होती. वहाँ राह चलते हिन्दू लड़कियों से छेडछाड बड़ी आम बात है. ऐसे कई सारे मामले भारत के अन्य मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में, विशेषकर पश्चिम बंगाल में, प्रकाश में आई है. वर्ग संघर्ष आम बात नहीं है जैसा कि मैंने पहले उल्लेख किया. हिन्दू आपस में लड़ते रहे हैं और मुसलमान आपस में. फिर हिन्दू और मुसलमानों के वर्ग संघर्ष को लोग नए दृष्टिकोण से क्यों देखते हैं?
अन्य किसी भी इस्लामिक देशों के विपरीत भारत के अल्पसंख्यकों, मुसलमान अल्पसंख्यक वर्ग के पर्याय बन गए हैं मानों सिख, जैन, बौध अस्तित्व में हैं ही नहीं, को हिन्दुओं के जितना ही बराबर का अधिकार प्राप्त है. बल्कि कई बार उन्हें ज्यादा तरजीह दी जाती है क्योंकि वे संख्या में कम हैं और हम धर्म निरपेक्ष बनने के चक्कर में और अधिक उदार बन जाते हैं. अफ़सोस यह छदम निरपेक्ष नेता ही धार्मिक उन्माद फैलाने के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं. जातिगत समरसता बढाने वाले ही जातिगत वैमनस्य बढाने के कारण हैं. अतः देश के मुसलमानों को यह भेदभाव का रोना रोने से पूर्व अपने पड़ोस के इस्लामिक देशों में अल्पसंख्यकों पर हो रहे यातना को भी ध्यान में रखना चाहिए. उन्हें बाबरी मस्जिद के टूटने पर शोक मनाने से पहले याद करना चाहिए कि किस तरह अनगिनत मुसलमान आक्रमणकारियों ने भारत की इज्जत- आबरू, धन- संपदा को कितनी बर्बरतापूर्वक लूटा. कितने लाख हिन्दू मंदिरों को नष्ट कर दिया. कितने हिन्दू औरतों को वेश्या बना दिया और कितने लाखों हिन्दुओं को इस्लाम कबूल करने पर मजबूर कर दिया. आज आपकी ९५% आबादी उन्ही हिन्दुओं में से आई है. फिर एक विवादस्पद मस्जिद टूटने पर इतना हो हल्ला क्यों? मैं किसी भी तरीके इस विद्हंस की सराहना नहीं करता, न ही मैं इस कायरतापूर्ण कार्य को उचित ठहरा रहा हूँ. मैं कुछ सवालों के जवाब तलाश रहा हूँ बस. दलितों ने जिस प्रकार ऐतिहासिक त्रुटियों को सुधारने के लिए आरक्षण का प्रावधान करवाया उसी प्रकार कुछ ऐतिहासिक त्रुटियों को दुरूस्त करने के लिए कुछ प्रचंड हिन्दुओं ने एक अफगानी आक्रमणकारी के द्वारा मंदिर तोड़कर बनवाई गयी मस्जिद को ध्वस्त कर प्रतिशोध लिया था. लेकिन अफ़सोस अक्सर कुछ उदंड लोगों की उदंडता का परिणाम निर्दोष मनुष्यों को भुगतना पड़ता है.
हर कारण (cause) का परिणाम (effect) भी होता है. १९९२ में कुछ उदंड हिन्दुओं की वजह से मुंबई में मुसलमानों ने घातक विस्फोट को अंजाम दिया. फिर २००२ कुछ मुसलमान दरिंदों की वजह से गुजरात दहल गया जब उन्होंने हिन्दू भक्तों को जिन्दा जला दिया और परिणामस्वरूप २,००० निर्दोष मुसलमान ख़त्म हो गए. आँख के बदले आँख की नीति से पूरा विश्व अंधा हो जाएगा. उन ओसामा बिन लादेन, मुल्ला ओमर, जवाहिरी, हफीज सईद, मुहम्मद सलाउद्दीन जैसे होनहार योद्धाओं से मेरा यह प्रश्न है कि उनका खून सद्दाम, गदाफी, मुबारक जैसों के प्रति क्यों नहीं खौला? तब आप कहाँ थे जब सद्दाम ने तक़रीबन तीन लाख लोगों का क़त्ल करवा दिया था या गद्दाफी ने लगभग ५०,००० मुसलमानों को २०११ के विद्रोह में मौत की नींद सुला दी थी या मुबारक ने अनगिनत मुसलमानों के हलाल कर दिया था? और अभी आजकल सीरिया में उनका अपना ही मुसलमान भाई असद अब तक १७,००० निर्दोषों का खून पी चुका है. आप क्या कर रहे हैं? आप को कश्मीर या भारत में नहीं वरन वहां जिहाद करना चाहिए जहाँ औरतों को सूअर से भी बदतर ज़िन्दगी नसीब नहीं. मेरा उन सब जिहाद के नाम पर निर्दोषों की ह्त्या करने वालों से अनुरोध हैं कि वे भारत जैसे शांति प्रिय देश को न छेड़े. हमें शान्ति से जीने दें. दिग्भ्रमित मुसलमानों से अपील है वे मूल धारा में शामिल होकर एक अच्छा इंसान, अच्छा भारतीय और फिर एक अच्छा मुसलमान बनें.
भारत में कई दंगें हुए हैं और आगे भी होते रहेंगें. यह मानवीय संघर्ष का सिलसिला हमेशा से चलता चला आ रहा है और आगे भी निः संदेह चलेगा. शुक्र मनाईये कि 'सांप्रदायिक दंगा बिल' अधिनियम नहीं बना अन्यथा सोनिया गांधी की कृपा से भारत में बहुसंख्यक और अधिक असुरक्षित हो जाते. हर दंगे के लिए आखिर आप बहुसंख्यकों को ही कैसे जिम्मेदार ठहरा सकते हैं? निः संदेह मुसलमानों को भारत जैसे धर्म निरपेक्ष देश में बराबरी का अधिकार है. लेकिन क्या उनका रवैया उत्तेजित करने वाला नहीं होता? शायद १९९८ में 'सहारा कप' के दौरान मैंने इलाहाबाद में देखा था कि कैसे सैकड़ों मुसलमानों ने भारत के हारने पर भड़काने वाले अंदाज़ में जश्न मनाया था. मुझे यकीन नहीं हुआ था उन मुसलमानों में इस कदर भारत के प्रति घृणा भरी है. मेरे अपने पूर्वी उत्तर प्रदेश के मऊ क्षेत्र में कुछ मुस्लिम बहुल इलाकों में मुसलमानों का जबरदस्त खौफ है. वहां से कई हिन्दुओं को पलायन करना पडा क्योंकि वे उनके बीच असुरक्षित महसूस करते थे. उन्हें अपने हिन्दू पर्व मनाने की अनौपचारिक रूप से अनुमति नहीं होती. वहाँ राह चलते हिन्दू लड़कियों से छेडछाड बड़ी आम बात है. ऐसे कई सारे मामले भारत के अन्य मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में, विशेषकर पश्चिम बंगाल में, प्रकाश में आई है. वर्ग संघर्ष आम बात नहीं है जैसा कि मैंने पहले उल्लेख किया. हिन्दू आपस में लड़ते रहे हैं और मुसलमान आपस में. फिर हिन्दू और मुसलमानों के वर्ग संघर्ष को लोग नए दृष्टिकोण से क्यों देखते हैं?
अन्य किसी भी इस्लामिक देशों के विपरीत भारत के अल्पसंख्यकों, मुसलमान अल्पसंख्यक वर्ग के पर्याय बन गए हैं मानों सिख, जैन, बौध अस्तित्व में हैं ही नहीं, को हिन्दुओं के जितना ही बराबर का अधिकार प्राप्त है. बल्कि कई बार उन्हें ज्यादा तरजीह दी जाती है क्योंकि वे संख्या में कम हैं और हम धर्म निरपेक्ष बनने के चक्कर में और अधिक उदार बन जाते हैं. अफ़सोस यह छदम निरपेक्ष नेता ही धार्मिक उन्माद फैलाने के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं. जातिगत समरसता बढाने वाले ही जातिगत वैमनस्य बढाने के कारण हैं. अतः देश के मुसलमानों को यह भेदभाव का रोना रोने से पूर्व अपने पड़ोस के इस्लामिक देशों में अल्पसंख्यकों पर हो रहे यातना को भी ध्यान में रखना चाहिए. उन्हें बाबरी मस्जिद के टूटने पर शोक मनाने से पहले याद करना चाहिए कि किस तरह अनगिनत मुसलमान आक्रमणकारियों ने भारत की इज्जत- आबरू, धन- संपदा को कितनी बर्बरतापूर्वक लूटा. कितने लाख हिन्दू मंदिरों को नष्ट कर दिया. कितने हिन्दू औरतों को वेश्या बना दिया और कितने लाखों हिन्दुओं को इस्लाम कबूल करने पर मजबूर कर दिया. आज आपकी ९५% आबादी उन्ही हिन्दुओं में से आई है. फिर एक विवादस्पद मस्जिद टूटने पर इतना हो हल्ला क्यों? मैं किसी भी तरीके इस विद्हंस की सराहना नहीं करता, न ही मैं इस कायरतापूर्ण कार्य को उचित ठहरा रहा हूँ. मैं कुछ सवालों के जवाब तलाश रहा हूँ बस. दलितों ने जिस प्रकार ऐतिहासिक त्रुटियों को सुधारने के लिए आरक्षण का प्रावधान करवाया उसी प्रकार कुछ ऐतिहासिक त्रुटियों को दुरूस्त करने के लिए कुछ प्रचंड हिन्दुओं ने एक अफगानी आक्रमणकारी के द्वारा मंदिर तोड़कर बनवाई गयी मस्जिद को ध्वस्त कर प्रतिशोध लिया था. लेकिन अफ़सोस अक्सर कुछ उदंड लोगों की उदंडता का परिणाम निर्दोष मनुष्यों को भुगतना पड़ता है.
हर कारण (cause) का परिणाम (effect) भी होता है. १९९२ में कुछ उदंड हिन्दुओं की वजह से मुंबई में मुसलमानों ने घातक विस्फोट को अंजाम दिया. फिर २००२ कुछ मुसलमान दरिंदों की वजह से गुजरात दहल गया जब उन्होंने हिन्दू भक्तों को जिन्दा जला दिया और परिणामस्वरूप २,००० निर्दोष मुसलमान ख़त्म हो गए. आँख के बदले आँख की नीति से पूरा विश्व अंधा हो जाएगा. उन ओसामा बिन लादेन, मुल्ला ओमर, जवाहिरी, हफीज सईद, मुहम्मद सलाउद्दीन जैसे होनहार योद्धाओं से मेरा यह प्रश्न है कि उनका खून सद्दाम, गदाफी, मुबारक जैसों के प्रति क्यों नहीं खौला? तब आप कहाँ थे जब सद्दाम ने तक़रीबन तीन लाख लोगों का क़त्ल करवा दिया था या गद्दाफी ने लगभग ५०,००० मुसलमानों को २०११ के विद्रोह में मौत की नींद सुला दी थी या मुबारक ने अनगिनत मुसलमानों के हलाल कर दिया था? और अभी आजकल सीरिया में उनका अपना ही मुसलमान भाई असद अब तक १७,००० निर्दोषों का खून पी चुका है. आप क्या कर रहे हैं? आप को कश्मीर या भारत में नहीं वरन वहां जिहाद करना चाहिए जहाँ औरतों को सूअर से भी बदतर ज़िन्दगी नसीब नहीं. मेरा उन सब जिहाद के नाम पर निर्दोषों की ह्त्या करने वालों से अनुरोध हैं कि वे भारत जैसे शांति प्रिय देश को न छेड़े. हमें शान्ति से जीने दें. दिग्भ्रमित मुसलमानों से अपील है वे मूल धारा में शामिल होकर एक अच्छा इंसान, अच्छा भारतीय और फिर एक अच्छा मुसलमान बनें.
