Monday, April 9, 2012

मनमोहन-जरदारी वार्तालाप का ट्रांसक्रिप्ट

जरदारी साब हाल ही में भारत अपने दल बल के साथ निजी यात्रा पर आये थे. प्रस्तुत है उनकी प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह के साथ हुई बातचीत का सक्षिप्त विवरण.
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जरदारी: मनमोहन पाजी, देखिये न! आपके और हमारे देश में कितना कुछ कामन है. मसलन भ्रष्टाचार. लेकिन आपके मुल्क को तो मान गए. इतने बड़े घोटाले करना हमारे मुल्क के लिए मुमकिन नहीं. सुना है कि लाखो करोड़ों के वारे न्यारे हुए हैं. अजी हिंदुस्तान हिंदुस्तान है और पाकिस्तान पाकिस्तान. दिल बहुत कचोटता है साब. ऐसे मौके हमें कहाँ नसीब.
मनमोहन: वो तो है जरदारी साब. लेकिन हमारा मुल्क भी तो बड़ा है. और वैसे भी बड़े बड़े देशों में बड़े बड़े घोटाले भी तो होंगें न? लेकिन मेरा यकीं मानिए मैं सोलह आने ईमानदार हूँ. कभी एक पैसे भी नहीं खाए.
जरदारी: अजी छोडिये भी. आज के जमाने में ऐसी ईमानदारी किस काम की? बड़े नेताओं के पेट भी बड़े होते हैं. और बरखुरदार ऐसे मौके बार बार नहीं आते. कुर्सी बड़ी बेवफा चीज़ है. एक दफा हाथ से फिसली तो फिर खुदा ही मालिक. नवाज़ को आपने देखा ही. इस मुशर्रफ को भी देख ही रहे हैं.
मनमोहन: बात तो सच कह रहे हो जी. लेकिन हमारे मुल्क में वैसी बात नहीं. यहाँ इतना बुरा....
जरदारी: (बात काटते हुए). पाजी खाना है बहुत लजीज. कुछ पैक भी करवा दीजियेगा गिलानी के लिए.
मनमोहन: क्यों नहीं जी. जरदारी साब आपसे ...
जरदारी: (बात काटते हुए). ऐसे खाना बहोत दिनों बाद नसीब हुआ है. बरसों पहले लाहोर में खाया था. तब हमारी मोहतरमा जिंदा थी (थोड़े जज्बाती हो जाते हैं).
मनमोहन : (टोकते हुए) मुझे अफ़सोस है. लेकिन आइये कुछ अहम् मसलों पे भी बातें हो जायें.
जरदारी: अजी, बातें शातें तो होती रहेगीं. वो भी कर लेंगें. (बिलवाल की तरफ मुखातिब होते हुए) है न बहुत लजीज खाना, पुत्तर?
मनमोहन: आतंकवाद को रोकने के लिए आप कुछ करते क्यूँ नहीं?
जरदारी: (बात काटते हुए). इक बात बताओ पाजी. आप एक ही रंग के कपडे पहन पहन के बोर नहीं होते? एक बार बुश ने भी मुझसे पूछ लिया था कि इस मनमोहन के पास कपडे नहीं हैं क्या? (खी खी खी....मजाक कर रिया था मैं तो).
मनमोहन: आतंकवाद...
जरदारी: आप तो वहीँ के वहीँ अटके पड़े हैं. अरे जो करना है अमेरिका कर रहा है न. ईमानदारी से कहूं तो ये अपने बस की बात है ही नहीं. मेरी तो न आर्मी सुनती है न आई एस आई. सच तो ये है मेरी खुद की सरकार भी नहीं सुनती. बस, यूँ समझिये कि जो आपका हाल है वही हमारा भी है.
मनमोहन: आपको इतने सारे सबूत दिए हमने. आप फिर भी रट लगाते हो सबूत नहीं मिले? (थोड़े गुस्से से, लेकिन मनमोहन खुद को भी आश्वस्त नहीं कर पाए कि उन्होंने गुस्सा किया था कि नहीं. या वो गुस्से में प्रतीत हुए भी थे कि नहीं क्योंकि जरदारी हड्डी मज़े से चूसते जा रहे थे).
जरदारी: खाना सच में है बहुत लाजबाब. आ! हाहा!!.
मनमोहन: हाफ़िज़ सईद को सजा क्यों नहीं दिलाते?
जरदारी: साब समझने की कोशिश कीजिये. हमने उसको छुआ भी नहीं कि समझिये सरकार की चूलें हिल जायेंगी. वो हमारे..वो आप लोग क्या कहते हैं...धरम गुरु...वो हैं. बड़ा रेस्पेक्ट है साब उनका हमारे यहाँ. हम जानते हैं आदमी है बड़ा खतरनाक. सबूत हमारे पास भी है लेकिन मजबूरी है. कुछ ऐसा पुख्ता सबूत दीजिये जो हमें भी न मालूम हो. फिर देखिये हम एक्शन कैसे नहीं लेते हैं.
मनमोहन: मुझे अफ़सोस है आपके १२४ सिपाही वर्फ में दबकर मर गए.
जरदारी: ऐसा क्या? कब हुआ ऐसा? ओहो. खैर छोडिये. जवान होते ही हैं सरहद पर मरने के लिए. आखिर पगार किस बात की लेते हैं. खाना बहुत जायकेदार था. छक के खाया मैंने तो. अच्छा, और कुछ है बात करने के लिए है आप के पास?
मनमोहन: नहीं मेरे पास तो कोई टोपिक नहीं.
जरदारी: मैं शायद कुछ भूल रहा हूँ. कुछ तो था जो बहूत अहम् था. अरे हाँ याद आया. कश्मीर.....
मनमोहन: हाँ. वहाँ मौसम बहुत अच्छा चल रहा है.
जरदारी: चलो अच्छा है. पाजी, अब आप भी कभी हमारे यहाँ आइये. अच्छा होगा आप इन्डियन क्रिकेट टीम को भी वहाँ खेलने भेजें.
मनमोहन: जी जरूर. आप राहुल बाबा को ले जाइये. क्रिकेट तो नहीं पर फिलहाल लूडो तो खेल ही सकते हैं ये दोनों बालक.
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तदुपरांत एक प्रेस रिलीज जारी हुआ.

दोनों देश के नेताओं ने लगभग हर महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातचीत की- आतंकवाद, भ्रष्टाचार, कश्मीर, क्रिकेट और सियाचिन. बातचीत बहुत अच्छे माहौल में हुई तथा काफी संतोषजनक रही. राष्ट्रपति जरदारी ने मनमोहन सिंह को पकिस्तान आने का न्योता दिया जिसे उन्होंने स्वीकार भी कर लिया.

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