घंटों बिजली कटौती से न सिर्फ आम नागरिक अपितु कार्पोरेट क्षेत्र और उद्योग भी परेशान हैं. अनियमित और अपर्याप्त बिजली आपूर्ति किसी अंचल या राज्य विशेष की नहीं वरन एक राष्ट्र व्यापी समस्या बन चुकी है. यह न केवल हमारे दैनिक जीवन को बुरी तरह प्रभावित करती है, देश की आर्थिक विकास की गति को भी अवरोधित करती है. यह इतना नियमित सा हो गया है कि बिजली के अभाव में हम जीने के आदी हो गए हैं और हमने मान लिया है कि सोलह घंटे अंधकार में रहना ही हमारी नियत है. किसी दिन दो घंटे अधिक आपूर्ति हो जाये तो एक सुखद आश्चर्य सा होता है. जरा सोचिये, क्या हमें चौबीसों घंटे बिजली नहीं मिल सकती? आखिर ऐसी क्या अडचने हैं आइये इस पर गौर करें.
वर्तमान स्थिति
साठ के दशक में हाइड्रोइलेक्ट्रिक बांधों के निर्माण पर अत्यधिक जोर दिया गया किन्तु धीरे धीरे कोयला आधारित (थर्मल) बिजली उत्पादन पर ज्यादा बल मिला और परिणामस्वरुप हाइड्रोइलेक्ट्रिक आधारित बिजली का योगदान ५० प्रतिशत से घटकर वर्तमान में १४ प्रतिशत पर आ गया है. हालांकि हाइड्रोपॉवर की भारत में उपस्थित असीमित संभावनाओं के बावजूद उनका समग्र विदोहन एक दिवा स्वप्न जैसा ही है. अधिकांश बिजली का निर्माण कोयले के द्वारा ही होता है और भविष्य में होने वाला ज्यादातर उत्पादन (लगभग ७० प्रतिशत) नए कोयला आधारित सयंत्रो से ही होने वाला है. एक अनुमान के तहत, तेरहवीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक तक़रीबन ३७० गीगावाट की बिजली उत्पादन क्षमता की आवश्यकता होगी ताकि भारत की ८ प्रतिशत की आर्थिक विकास दर को बनाये रखा जा सके. ऐसे में कोयले की आवश्यक आपूर्ति एक महत्वपूर्ण चुनौती है क्योंकि कोल इंडिया का भारत में कोयले के खदानों एवं खनन पर लगभग एकाधिकार है और निरंतर बढ़ती मांग को पूरा करने में वह असमर्थ रहा है. बारहवीं पंचवर्षीय योजना में सरकार सौ गीगावाट की बिजली परियोजना लगाने की महत्वकांक्षी योजना बना रही है परन्तु चुनौतियाँ भी अत्यंत कठिन एवं व्यापक हैं.
चुनौतियाँ: डगर इतना आसान भी नहीं
१. भूमि अधिग्रहण- यह सबसे बड़ी समस्या बनकर उभरा है. किसी भी उपक्रम या सयंत्र को लगाने के लिए भूमि की आवश्यकता होती है. और ऐसी भूमि की प्रायः मांग वहीँ होती हैं जहां घनी आबादी है अथवा जमीं कृषक कार्यों में उपयोग में लायी जाती है. कृषक उचित मूल्य और उनकी आर्थिक विकास में भागीदारी सुनिश्चित करने के बावजूद भी भूमि अधिग्रहण का विरोध करते हैं. संगूर और नोएडा में हम देख चुके हैं. इसके अलावा उनका भली भांति विस्थापन एक बहुत बड़ी चुनौती होती है. अन्यथा कृषक भूमिहीन श्रमिक बनकर रह जाता है. वोट बैंक के चलते राजनैतिक रूप से यह मुद्दा इतना संवेदनशील हो जाता है कि कार्पोरेट क्षेत्र सरकार से हस्तक्षेप की अपेक्षा करता है और सरकार इससे पल्ला झाड लेना चाहती है. कोल इंडिया के अनुसार खनन समस्या नहीं है लेकिन उसे खुली जगह चाहिए ताकि कोयले को खदान से खनन के पश्चात वहां रखा जा सके.
२. कोयले की आपूर्ति- तेजी से बढ़ते बिजली उत्पादन क्षमता और कोयले की मांग के बावजूद, कोल इंडिया के खनन की गति और उत्पादन दर स्थिर रही है. इसके अलावा इसके अधिकतर कोल रिजर्व्स माओवादी क्षेत्र में हैं जहाँ खनन कार्य अत्यंत चुनौतीपूर्ण होता है. और तो और कोयला माफिया द्वारा बड़े स्तर पर कोयले की चोरी, कर्मचारियों के मिलीभगत से पनपा भ्रष्टाचार भी समस्या को बढ़ा देता है. इससे त्रस्त कई निजी क्षेत्र की कंपनिया कोयले का आयात करतीं हैं और पिछले छह वर्षों में करीब ३४,००० करोड़ रुपये आस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया और अफ्रीका में कोयले के खदान खरीदने में निवेश किये जा चुके हैं. चूँकि आयातित कोयले की गुणवत्ता क्ष्रेष्ट होती है उनकी कीमतें भी लगभग चार गुनी अधिक होती हैं. चीन से बढती मांग से कीमतों में और उछाल आ जाता है. इसके अलावा, कुछ देश बढती हुई मांग को हतोत्साहित करने के लिए करों में वृद्धि तथा विदेशी निवेश की सीमा निर्धारित करने जैसे कदम भी उठा देते हैं. लेकिन सबसे गंभीर प्रश्न यह है क्या हम सिर्फ आयातित कोयले पर आश्रित रह सकते हैं? बारहवीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक घरेलू कोयले से केवल ७० प्रतिशत मांग की ही आपूर्ति हो सकती है. तो शेष दो सौ पचास मिलियन टन से अधिक कोयले की मांग, जो कि वर्तमान आयात का पांच गुना है, की आपूर्ति केवल आयात से करना निःसंदेह ही मुश्किल है.
३. वितरण कंपनियों का बढ़ता घाटा- ज्यादातर बिजली का वितरण राज्यों के बिजली बोर्डों द्वारा होता है और अधिकांशतः अपार घाटे में चल रहीं हैं. उनके घाटे का सबसे प्रमुख कारण बढ़ता लागत और वसूली के बीच का अंतर है. बढ़ते उत्पादन लागत, विशेष रूप से कोयले की लागत के कारण, वितरण कंपनियों को मह्गीं बिजली खरीदनी पड़ती है.जबकि भारी राजनैतिक दबाव की वजह से उनपर टैरिफ न बढाने का अत्यंत दबाव होता है. इसके अलावा, राज्य उनको देय सब्सिडी के भुगतान में भी बहुत देरी करते हैं. २००९-१० में राज्यों ने मात्र ५६ प्रतिशत ही सब्सिडी रिलीज़ किया. बिजली कंपनियों का घाटा २००७-०८ के ३१,९१० करोड़ रूपये से बढ़कर २००९-१० में ६३,५४८ करोड़ रूपये हो गया.यही हाल रहा तो अनुमान है कि यह वर्ष २०१५ तक १५०,००० करोड़ हो जायेगा. उनकी बिगड़ती आर्थिक स्थिति के कारण वे बिजली खरीदना बंद कर देती हैं और लोड शेडिंग यानी बिजली की कटौती करना शुरू कर देती हैं ताकि उनका घाटा कुछ कम हो सके. और जब तक कोई चुनाव सन्मुख न हो, राज्य सरकारों का भी उन पर कोई विशेष दबाव नहीं होता.
४. बिजली चोरी- बिजली की चोरी अत्यंत गंभीर समस्या रही है. भारत में तक़रीबन ४० प्रतिशत बिजली चोरी हो जाती रही है. यद्दपि इसे रोकने के प्रयास हो रहे हैं. आर- एपी डी आर पी योजना के तहत वितरण कंपनियों को उनके ऐ टी एंड सी घाटों को १५ प्रतिशत तक लाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है जिसमें कुछ सफलता भी मिल रही है.आपके प्रदेश सहित अन्य राज्यों जैसे छत्तीसगढ़, ओडिशा, उत्तराखंड, राजस्थान और पश्चिम बंगाल में ३०-४० प्रतिशत की चोरी हो जाती है जबकि मध्य प्रदेश में ४०% से भी ज्यादा. दिल्ली, गुजरात, महाराष्ट्र, असाम, कर्णाटक और हरियाणा इसे २०-३० प्रतिशत तक लाने में सफल रहे हैं जबकि आंध्र प्रदेश में सबसे कम बिजली चोरी होती है यानी २०% से भी कम.
५. अन्य समस्याएं- हालांकि कुछेक राज्यों ने टैरिफ बढाया है लेकिन वह नाकाफी है. बिजली कंपनियों का बढ़ता आर्थिक संकट शीघ्र ही उन्हें लील लेगा यदि कोई कारगर ठोस कदम नहीं उठाया गया. इसके लिए बहुत आवश्यक है कि इसमें राजनितिक हस्तक्षेप बंद किया जाय, वितरण कंपनियों का निजीकरण किया जाय तथा टैरिफ वृद्धि में पर्याप्त पारदर्शिता एवं नियमितता लायी जाय. इसके अलावा, राज्य बिजली बोर्डों के बढ़ते घाटे के कारण एक तो वे मह्गीं बिजली नहीं खरीद पाते, बैंक उन्हें ऋण देने से कतराते हैं तथा वे अपने उपक्रमों एवं सयंत्रों का विस्तार और आधुनिकीकरण करने में असमर्थ होते हैं. इस प्रकार विकास के नाम पर अन्धाधुन खनन से पर्यावरण तो प्रभावित होता ही है पारिस्थितिक तंत्र भी बिगड़ता है.
अंधकारमय भविष्य
अब तक आपको समझ आ गया होगा कि चौबीसों घंटे बिजली आपूर्ति लगभग असंभव है. आये दिन होनेवाले चुनावों में राजनैतिक पार्टियां मुफ्त बिजली की घोषणाएं करती हैं. यह न सिर्फ गैर जिम्मेदाराना है बल्कि इससे राज्य सरकारों के कोषों पर भारी दबाव पड़ता है तथा वितरण कंपनियों के लिए प्राणघातक सिद्ध होता है. अपने प्रदेश में अनेक गरीब किसान बिजली के अभाव में महगें डीजल जेनेरेटरों के प्रयोग पर विवश हैं. यदि उन्हें थोड़ी महगीं दरों पर भी बिजली मिले तो उन्हें विशेष आपत्ति नहीं होनी चाहिए. समय आ गया है जब राजनैतिक पार्टियां अपनी छदम स्वार्थों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित में सोचें. आखिर, थोड़े से अल्पकालिक लाभों के लिए दीर्घकालिक क्षतियों की अवहेलना नहीं की जा सकती. एक जिम्मेदार नागरिक के तौर हमारी भी कुछ जिम्मेदारियां हैं. आइये, बिजली बचाकर और बिजली चोरी को रोककर राष्ट्र की प्रगति अपना अमूल्य योगदान दें.

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