बचपन की कई कहानियां कभी कभी अनायास याद आ जाती हैं. और लगता है कितनी अवास्तविक होती थीं वो. आज बारिश में भींगते कौओं ने याद दिलाई कौए और गिलहरी की कहानी. किसने कहा कौए मेहनत नहीं करते? कामचोर होते हैं? अपनी आँखों से देखा उन बिन रेनकोट के भींगते, कांपते कौओं को जो बुरी तरह थरथरा रहे थे लेकिन फिर भी घुटने भर पानी में खाना तलाश रहे थे. वक़्त तो नहीं बदल गया? कहीं कौओं ने मेहनत करना तो नहीं सीख लिया? मजबूरी में लोग क्या क्या नहीं करते हैं?
कछुए और खरगोश की कहानी भी बस कमजोर को दिलासा देने के लिए ही लिखी गयी थी. कछुआ कुछ भी कर ले खरगोश से बाज़ी जीतना नामुमकिन ही है. अगर एक बार गलती हो भी गयी तो कोई बार बार ऐसी गलती थोड़े नहीं करेगा. दुनिया की रफ़्तार रोज ही बढ़ती जा रही है, ऐसे में बेचारे कछुए ऐसे भ्रम पाले बैठे रहें. आज परीक्षा में ९५ फ़ीसदी लानेवाले भी फिसड्डी साबित हो रहे हैं तो महज पास भर होने वाले क्या उखाड़ लेंगे भला? आज कल तो भैय्या ज़माना उलटा हो गया है. गीदड़ भभकी देने वाले माल उड़ा ले जाते हैं जबकि शेरों ने मिमियाना सीख लिया है. मायने बदल रहे हैं, मानदंड बदल रहे हैं. हम कब बच्चों को झूठी कहानियाँ सुना सुना कर उन्हें अँधेरे में रक्खेंगे? यह "गूगल" का दौर है और कोई भी जानकारी बस चुटकी में मिल जाती है. बच्चे बल्कि हमसे ज्यादा स्मार्ट हो गए हैं. वक़्त आ गया है जब उन्हें कहें "बेटा सच, बोलना ठीक बात है लेकिन अगर उससे काम बिगड़ता हो तो वह बेवकूफी है". अब जब बच्चे अडल्ट फिल्में देखने और समझने भी लगे हैं तो कुत्ते बिल्ली, राजे रानियों के पुराने किस्से सुनाने से क्या फायदा?
Hope
8 years ago
