आइए मैं बताउं कि विकास का सिद्धान्त क्यूं सरासर मनघरंत और बेबुनियाद है. अरे कभी चींटी को हाथी या बन्दर को आदमी बनते देखा है किसी ने? मेरी मानिए तो कुछ यूं हुआ होगा. भगवान जब हर प्रकार कीड़े मकोड़ों और जानवरों को बनाकर और उनसे खेल खेल कर उब गया होगा तो उसने और बेहतर करने का निश्चय किया होगा. बहुत परेशान रहा होगा कि क्या नया करूं और फिर एक ऐसे प्राणी को बनाने की परिकल्पना की होगी जिसमें अब तक के सारे कीड़े मकोड़ों और जानवरों के गुण समाहित हों. इस तरह मनुष्य पृथ्वी पर अवतरित हुआ होगा. पेश हैं कुछ पुखता सुबूत:
नकल करने की प्रवृति हमने बन्दरों से पाई.
चापलूसी करने और मुफ्त की खाने की विशेषता कुत्तों से विरासत में मिली.
दूसरों का माल हडप जाने की कला नर शेरों से प्राप्त हुई.
घडियाली आंसू बहाना किसने सिखाया आप जानते हैं.
लड़की के लिए मूर्ख की भाँती जान पर खेलना मधुमक्खिओं से आया.
कोयल से गाना बजाना, मोर से नाचना और उल्बिलाव से संजना संवरना सीखा.
सामाजिक रहन सहन दीमकों से सबक लेकर आई.
गिरगिट से रंग बदलना, भेडों से भेंडचाल, सियार से व्यर्थ का शोर मचाना.
घात लगाकर वार करना बाघों ने सीखाया.
जेली फिश से औरतों ने बहुत कुछ सीखा है.
गधे की तरह काम करना और मार भी खाना बेशक गधों से ही सीखा.
तोतों से बिना दिमाग लगाए रट जाने की महारत हासिल की.
आवारागर्दी और निठाल्लापन कौओं ने दी.
कहिये आपकी क्या राय हैं मेरे इस प्रतिपादित सिद्धान्त के बारे में? अब लाख टके का अनुत्तरित प्रश्न यह है कि मनुष्यों में सोचने समझने की शक्ति कहाँ से आई? वैसे यह हरेक इन्सानों में बराबर रुप से नहीं बांटी गई. हममें से कई जानवरों से भी कम अकल का इस्तेमाल करते हैं.
Hope
8 years ago

chalo aaj pate ki baat ki hai
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