Sunday, February 28, 2010

दोगले लोग

अपने देश में सिर्फ नेताओं और वामपंथियों में ही दोगलेपन के गुण नहीं पाए जाते. एक बहुत बड़ा बुद्धजीवी वर्ग भी इस महामारी से ग्रसित रहा है. यह वर्ग अपने उदार छवि के प्रति इतना सजग रहता है कि वह सब कुछ बर्दाश्त कर सकता है लेकिन अपने उदार विचारों और मूल्यों से कतई समझौता नहीं कर सकता. इनके दोगलेपन का डी एन ए इन्हें इतना विवश कर देता है कि यह हमेशा उदार बने रहें. परन्तु उनकी यह उदार निष्ठा एक ख़ास किस्म के लोगों के प्रति ही रहती है. उनके इतर इनकी सोच कुंठीत हो जाती है, सिद्धांतों को लकवा मार जाता है, मुंह में कोढ़ हो जाता है और सच कह पाने में दम निकल जाता है.

मैं मानता हूँ अभिव्यक्ति का अधिकार सबको है (मैं अपने देश भारत की बात कर रहा हूँ, किसी इस्लामिक देश की नहीं). और किसी को सोचने, प्रश्न करने और अपने अनुसार जीने का पूरा अधिकार है ऐसा मानता हूँ. ऐसे किसी भी प्रयास जिससे इन अधिकारों में क्षय हो, हतोत्साहित किये जाने चाहिए. एम एफ हुसैन एक महान कलाकार हैं इसमें कोई दो राय नहीं. इस कलाकार ने जब राम की सीता को नंगी करके रावन के नंगी जाँघों पर बिठा कर स्वयं को महान कलाकार सिद्ध करने का बिगुल बजाया तो मुझे दिक् नहीं हुई. इसने भारत माँ को ऐसे ही विचित्र रूप में चित्रित किया तो भी शिकन नहीं उठे. कला में नग्नता क्षम्य होती है. लेकिन यह बात तब क्यूँ लागू नहीं होती जब उसने अपनी माँ को पेंट किया? क्या इस धर्म निरपेक्ष कलाकार ने क्रूर और हवसी इस्लाम के पैगम्बर -मुहम्मद- को चित्रित करने के योग्य नहीं समझा? मरियम को नंगा करके घोड़े या सांढ़ पर क्यूँ नहीं दौड़ाया? इसलिए कि हिन्दू उदार और बुजदिल कौम है? इसलिए कि मुस्लिम क्रूर और बर्बर प्रजाति है जहां औरत सिर्फ बच्चे पैदा करने और मजा लूटने की मशीन भर है?

हमारा धर्म हमें प्रश्न करने को प्रेरित करता है और आँख मूंदकर भेडचाल चलने को हतोत्साहित भी करता है. हुसैन को क़तर की नागरिकता मिलने पर यह विक्षिप्त बुद्धजीवी वर्ग त्राहिमाम त्राहिमाम कर उठा है. बेशक मुझे हिंसक हिन्दू कट्टरपंथियों से कोई हमदर्दी नहीं लेकिन लोगों के दोगलेपन से बहुत आहत हो जाता हूँ. ऐसे नपुंसक, उदार, घटिया बुद्धजीवी तथा छदम धर्म निरपेक्ष लोगों को नंगा करके शहर में घुमाना चाहिए.

Saturday, February 27, 2010

बच्चन उवाच

अमिताभ बच्चन सठिया गए हैं जो अपने ब्लॉग पर उल जुलूल बातें लिखते रहते हैं. वो महान प्रेत आत्माएं हैं ही जो उनकी बकवास अखबारों में छापते हैं तथा वो लोग अहले दर्जे के चू *** हैं जो उन्हें पढ़ते हैं. उन्हें दस्त हो या उनकी बहू बीमार पड़ जायें तो यह कोई खबर है और क्या उन्हें और कोई विषय नहीं सूझता लिखने के लिए? दरअसल मीडिया की यह जिम्मेदारी बनती है कि वो हमें सही और जरूरी खबर दे ना कि बकवास खबरें छाप कर व्यर्थ ही संसाधनों और पाठकों के समय का दुरुपयोग करे.