Wednesday, January 13, 2010

बर्थडे

गत वर्ष के आखिरी महिने में मेरा बर्थडे आया और आकर मुझे एक साल और बुढा कर चला गया. यूं तो बुढे होने के चिन्ह तो पहले से ही दिख रहे हैं. पहले सर के पके बाल गिनता था अब दाढी के. बहुत झुंझलाहट सी होती हैं यह सोचकर कि मैं बूढा हो रहा हू. एकाध अपने भावुक दोस्तो ने फोन करके विश किया, बस. मन गया बर्थडे. हालाँकि मैं किसी से कोई अपेक्षा नहीं रखता लेकिन बड़ा अच्छा लगता है अगर कोई मुझे याद करता है. वैसे सालभर लोग पूछेंगें कि मेरा बर्थडे कब है.
खैर. अजीब बात नहीं कि अब इन सारी सुविधायों के बावजूद हम अपने इष्ट मित्रों से संपर्क नहीं कर पाते? फुर्सत ही नहीं, है ना? पहले लोग फोन इसलिए नहीं करते थे कि काल रेट बहुत ज्यादा था. अब जैसे जैसे दरें गिर रहीं हैं फोन करना तो दूर लोग मैसेज करना भी उचित नहीं समझते हैं. शायद कास्ट कटिंग कर रहे होंगें. मंहगाई जो इतनी बढ़ गयी है.

दोस्तों को याद नहीं रहा लेकिन मुझे मोबाइल फोन वाले, इन्सुरेंस वाले, बर्थडे केक बनाने वाले, कपडे बेचने वाले, घड़ी बेचने वाले वगैरह कभी नहीं भूले. उन्होंने मुझे याद किया, मुझे बर्थडे पर विश किया. और क्या चाहिए किसी को? कहते हैं भगवान जब सारे दरवाजे बंद कर देता है तो एक खिद्खी जरूर खोल देता है.

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