Wednesday, January 13, 2010

भरत वियोग

इतना दुख तो मुझे राम और भरत के बिछडणे पर भी नहीं hua था जितना आज अमर सिंग और मुलायम के होने पर होता हैं. जैसे जिस्म से रूह अलग हो गया हो. इनका भात्र प्रेम मुझे हमेशा भाव विव्हल करता रहा हैं. कई बार कोशिश की इनके पवित्र रिश्तो को समझने की मगर असफल ही रहा. सुब्रतो रॉय ने मुलायम सिंग को, अमर सिंग ने सुब्रतो को, अमिताभ ने अमर सिंग को बडे भैया बनाया फिर पूरा फिल्मी संसार उनका भाई- बहन होने को बेताब हो गया और यह परिवार इतना बडा हो गया कि समझना और जटील हो गया. फिर एक दिन मायावती का पूरे उत्तर प्रदेश में मायाजाल फैल गया. और यह पूरा कुनबा चित हो गया. जब आरबीआई ने शिकंजा कसना शुरू किया तो सुब्रतो ने कांग्रेस की तरफ पिंगे बढाना शुरू कर दिया और राजीव शुक्ला को भाई बना लिया. अमर भैया बुरी तरह चिढ गये. और जब माया मिली न राम (यानी न सेंटर में सत्ता मिली न प्रदेश में) तो मुलायम भैया को भी अपने खून के भाईयो की ही सुननी पडी.

मुझे भी एक अदद ऐसे ही बडे भाई की तलाश हैं. राहुल (गांधी)तुम सुन रहे हो?

बर्थडे

गत वर्ष के आखिरी महिने में मेरा बर्थडे आया और आकर मुझे एक साल और बुढा कर चला गया. यूं तो बुढे होने के चिन्ह तो पहले से ही दिख रहे हैं. पहले सर के पके बाल गिनता था अब दाढी के. बहुत झुंझलाहट सी होती हैं यह सोचकर कि मैं बूढा हो रहा हू. एकाध अपने भावुक दोस्तो ने फोन करके विश किया, बस. मन गया बर्थडे. हालाँकि मैं किसी से कोई अपेक्षा नहीं रखता लेकिन बड़ा अच्छा लगता है अगर कोई मुझे याद करता है. वैसे सालभर लोग पूछेंगें कि मेरा बर्थडे कब है.
खैर. अजीब बात नहीं कि अब इन सारी सुविधायों के बावजूद हम अपने इष्ट मित्रों से संपर्क नहीं कर पाते? फुर्सत ही नहीं, है ना? पहले लोग फोन इसलिए नहीं करते थे कि काल रेट बहुत ज्यादा था. अब जैसे जैसे दरें गिर रहीं हैं फोन करना तो दूर लोग मैसेज करना भी उचित नहीं समझते हैं. शायद कास्ट कटिंग कर रहे होंगें. मंहगाई जो इतनी बढ़ गयी है.

दोस्तों को याद नहीं रहा लेकिन मुझे मोबाइल फोन वाले, इन्सुरेंस वाले, बर्थडे केक बनाने वाले, कपडे बेचने वाले, घड़ी बेचने वाले वगैरह कभी नहीं भूले. उन्होंने मुझे याद किया, मुझे बर्थडे पर विश किया. और क्या चाहिए किसी को? कहते हैं भगवान जब सारे दरवाजे बंद कर देता है तो एक खिद्खी जरूर खोल देता है.