Sunday, November 14, 2010

कहत कबीर सुनो भाई साधो!!

ज़िन्दगी के जब कुछ अहम् फलसफों को, गूढ़ से गूढ़ बातों को सामान्य जनता की सरल भाषा में कहने की बात चले तो संत कबीर का नाम सर्वप्रथम आता है. आज भी जब मैं उन्हें पढ़ता हूँ तो बड़ा ही आश्चर्य होता है कि वे लगभग पांच सौ साल बाद भी कितने प्रासंगिक हैं. उनके कुछ चुनिन्दा दोहों को यहाँ प्रस्तुत करते हुए मुझे अपार प्रसन्नता हो रही है. आशा है इक्कीसवीं सदी की इस भागम भाग, रेलम पेल ज़िन्दगी जीने वाली डिस्को पीढी को भी कबीर के दोहे ना सिर्फ पसंद आयेगे अपितु झकझोरेगें भी. वावजूद इसके की कि ये रचनाएँ हिंदी भाषा के प्रादुर्भाव के शताब्दियों पूर्व के हैं, इनके मायने आसानी से समझ में आते हैं.


तिनका कबहूँ ना निंदिये, पाँव तले जो होय
कबहूँ उड़ आँखों पड़े, पीर घनेरी होय.

दुःख में सुमिरन सब करें, सुख में करे ना कोय
जो सुख में सुमिरन करे, दुःख काहे को होय.

माला फेरत जुग भया, फिर न मन का फेर
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर.

साई इतना दीजिये, जामें कुटुम समाय
मैं भी भूखा न रहूँ, साधू ना भूखा जाय.

लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट
पाछे फिर पछताओगे, प्राण जाहीं जब छूट.

पांच पहर धंधे गया, तीन पहर गया सोय
एक पहर हरि नाम बिनु, मुक्ती कैसे होय.

धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आये फल होय.

क्षमा बडन को चाहिए, छोटन को उत्पात
कहा विष्णु कौ घट गयो, जो भृगु मारी लात.

माटी कहे कुम्हार से, तू क्यों रौंदे मोय
इक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय.

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब
पल में प्रलय होयगी, बहुरि करेगा कब.

जो तोकू काँटा बुवे, ताहि बोय तू फूल
तोकूं फूल के फूल हैं, वाकूं हैं त्रिशूल.

दुर्बल को ना सताइए, जाकी मोटी हाय
बिना जीव की सांस सों, लोह भस्म हो जाय.

आया था किस काम को, तू सोया चादर तान
सूरत संभल ऐ गाफिल, अपना आपा पहचान.

ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय
औरन को शीतल करे, आपु शीतल होय.

Saturday, July 3, 2010

झूठी कहानियां

बचपन की कई कहानियां कभी कभी अनायास याद आ जाती हैं. और लगता है कितनी अवास्तविक होती थीं वो. आज बारिश में भींगते कौओं ने याद दिलाई कौए और गिलहरी की कहानी. किसने कहा कौए मेहनत नहीं करते? कामचोर होते हैं? अपनी आँखों से देखा उन बिन रेनकोट के भींगते, कांपते कौओं को जो बुरी तरह थरथरा रहे थे लेकिन फिर भी घुटने भर पानी में खाना तलाश रहे थे. वक़्त तो नहीं बदल गया? कहीं कौओं ने मेहनत करना तो नहीं सीख लिया? मजबूरी में लोग क्या क्या नहीं करते हैं?

कछुए और खरगोश की कहानी भी बस कमजोर को दिलासा देने के लिए ही लिखी गयी थी. कछुआ कुछ भी कर ले खरगोश से बाज़ी जीतना नामुमकिन ही है. अगर एक बार गलती हो भी गयी तो कोई बार बार ऐसी गलती थोड़े नहीं करेगा. दुनिया की रफ़्तार रोज ही बढ़ती जा रही है, ऐसे में बेचारे कछुए ऐसे भ्रम पाले बैठे रहें. आज परीक्षा में ९५ फ़ीसदी लानेवाले भी फिसड्डी साबित हो रहे हैं तो महज पास भर होने वाले क्या उखाड़ लेंगे भला? आज कल तो भैय्या ज़माना उलटा हो गया है. गीदड़ भभकी देने वाले माल उड़ा ले जाते हैं जबकि शेरों ने मिमियाना सीख लिया है. मायने बदल रहे हैं, मानदंड बदल रहे हैं. हम कब बच्चों को झूठी कहानियाँ सुना सुना कर उन्हें अँधेरे में रक्खेंगे? यह "गूगल" का दौर है और कोई भी जानकारी बस चुटकी में मिल जाती है. बच्चे बल्कि हमसे ज्यादा स्मार्ट हो गए हैं. वक़्त आ गया है जब उन्हें कहें "बेटा सच, बोलना ठीक बात है लेकिन अगर उससे काम बिगड़ता हो तो वह बेवकूफी है". अब जब बच्चे अडल्ट फिल्में देखने और समझने भी लगे हैं तो कुत्ते बिल्ली, राजे रानियों के पुराने किस्से सुनाने से क्या फायदा?

Wednesday, March 24, 2010

विकास का 'नया' सिद्धान्त

आइए मैं बताउं कि विकास का सिद्धान्त क्यूं सरासर मनघरंत और बेबुनियाद है. अरे कभी चींटी को हाथी या बन्दर को आदमी बनते देखा है किसी ने? मेरी मानिए तो कुछ यूं हुआ होगा. भगवान जब हर प्रकार कीड़े मकोड़ों और जानवरों को बनाकर और उनसे खेल खेल कर उब गया होगा तो उसने और बेहतर करने का निश्चय किया होगा. बहुत परेशान रहा होगा कि क्या नया करूं और फिर एक ऐसे प्राणी को बनाने की परिकल्पना की होगी जिसमें अब तक के सारे कीड़े मकोड़ों और जानवरों के गुण समाहित हों. इस तरह मनुष्य पृथ्वी पर अवतरित हुआ होगा. पेश हैं कुछ पुखता सुबूत:

नकल करने की प्रवृति हमने बन्दरों से पाई.
चापलूसी करने और मुफ्त की खाने की विशेषता कुत्तों से विरासत में मिली.
दूसरों का माल हडप जाने की कला नर शेरों से प्राप्त हुई.
घडियाली आंसू बहाना किसने सिखाया आप जानते हैं.
लड़की के लिए मूर्ख की भाँती जान पर खेलना मधुमक्खिओं से आया.
कोयल से गाना बजाना, मोर से नाचना और उल्बिलाव से संजना संवरना सीखा.
सामाजिक रहन सहन दीमकों से सबक लेकर आई.
गिरगिट से रंग बदलना, भेडों से भेंडचाल, सियार से व्यर्थ का शोर मचाना.
घात लगाकर वार करना बाघों ने सीखाया.
जेली फिश से औरतों ने बहुत कुछ सीखा है.
गधे की तरह काम करना और मार भी खाना बेशक गधों से ही सीखा.
तोतों से बिना दिमाग लगाए रट जाने की महारत हासिल की.
आवारागर्दी और निठाल्लापन कौओं ने दी.

कहिये आपकी क्या राय हैं मेरे इस प्रतिपादित सिद्धान्त के बारे में? अब लाख टके का अनुत्तरित प्रश्न यह है कि मनुष्यों में सोचने समझने की शक्ति कहाँ से आई? वैसे यह हरेक इन्सानों में बराबर रुप से नहीं बांटी गई. हममें से कई जानवरों से भी कम अकल का इस्तेमाल करते हैं.

Sunday, February 28, 2010

दोगले लोग

अपने देश में सिर्फ नेताओं और वामपंथियों में ही दोगलेपन के गुण नहीं पाए जाते. एक बहुत बड़ा बुद्धजीवी वर्ग भी इस महामारी से ग्रसित रहा है. यह वर्ग अपने उदार छवि के प्रति इतना सजग रहता है कि वह सब कुछ बर्दाश्त कर सकता है लेकिन अपने उदार विचारों और मूल्यों से कतई समझौता नहीं कर सकता. इनके दोगलेपन का डी एन ए इन्हें इतना विवश कर देता है कि यह हमेशा उदार बने रहें. परन्तु उनकी यह उदार निष्ठा एक ख़ास किस्म के लोगों के प्रति ही रहती है. उनके इतर इनकी सोच कुंठीत हो जाती है, सिद्धांतों को लकवा मार जाता है, मुंह में कोढ़ हो जाता है और सच कह पाने में दम निकल जाता है.

मैं मानता हूँ अभिव्यक्ति का अधिकार सबको है (मैं अपने देश भारत की बात कर रहा हूँ, किसी इस्लामिक देश की नहीं). और किसी को सोचने, प्रश्न करने और अपने अनुसार जीने का पूरा अधिकार है ऐसा मानता हूँ. ऐसे किसी भी प्रयास जिससे इन अधिकारों में क्षय हो, हतोत्साहित किये जाने चाहिए. एम एफ हुसैन एक महान कलाकार हैं इसमें कोई दो राय नहीं. इस कलाकार ने जब राम की सीता को नंगी करके रावन के नंगी जाँघों पर बिठा कर स्वयं को महान कलाकार सिद्ध करने का बिगुल बजाया तो मुझे दिक् नहीं हुई. इसने भारत माँ को ऐसे ही विचित्र रूप में चित्रित किया तो भी शिकन नहीं उठे. कला में नग्नता क्षम्य होती है. लेकिन यह बात तब क्यूँ लागू नहीं होती जब उसने अपनी माँ को पेंट किया? क्या इस धर्म निरपेक्ष कलाकार ने क्रूर और हवसी इस्लाम के पैगम्बर -मुहम्मद- को चित्रित करने के योग्य नहीं समझा? मरियम को नंगा करके घोड़े या सांढ़ पर क्यूँ नहीं दौड़ाया? इसलिए कि हिन्दू उदार और बुजदिल कौम है? इसलिए कि मुस्लिम क्रूर और बर्बर प्रजाति है जहां औरत सिर्फ बच्चे पैदा करने और मजा लूटने की मशीन भर है?

हमारा धर्म हमें प्रश्न करने को प्रेरित करता है और आँख मूंदकर भेडचाल चलने को हतोत्साहित भी करता है. हुसैन को क़तर की नागरिकता मिलने पर यह विक्षिप्त बुद्धजीवी वर्ग त्राहिमाम त्राहिमाम कर उठा है. बेशक मुझे हिंसक हिन्दू कट्टरपंथियों से कोई हमदर्दी नहीं लेकिन लोगों के दोगलेपन से बहुत आहत हो जाता हूँ. ऐसे नपुंसक, उदार, घटिया बुद्धजीवी तथा छदम धर्म निरपेक्ष लोगों को नंगा करके शहर में घुमाना चाहिए.

Saturday, February 27, 2010

बच्चन उवाच

अमिताभ बच्चन सठिया गए हैं जो अपने ब्लॉग पर उल जुलूल बातें लिखते रहते हैं. वो महान प्रेत आत्माएं हैं ही जो उनकी बकवास अखबारों में छापते हैं तथा वो लोग अहले दर्जे के चू *** हैं जो उन्हें पढ़ते हैं. उन्हें दस्त हो या उनकी बहू बीमार पड़ जायें तो यह कोई खबर है और क्या उन्हें और कोई विषय नहीं सूझता लिखने के लिए? दरअसल मीडिया की यह जिम्मेदारी बनती है कि वो हमें सही और जरूरी खबर दे ना कि बकवास खबरें छाप कर व्यर्थ ही संसाधनों और पाठकों के समय का दुरुपयोग करे.

Wednesday, January 13, 2010

भरत वियोग

इतना दुख तो मुझे राम और भरत के बिछडणे पर भी नहीं hua था जितना आज अमर सिंग और मुलायम के होने पर होता हैं. जैसे जिस्म से रूह अलग हो गया हो. इनका भात्र प्रेम मुझे हमेशा भाव विव्हल करता रहा हैं. कई बार कोशिश की इनके पवित्र रिश्तो को समझने की मगर असफल ही रहा. सुब्रतो रॉय ने मुलायम सिंग को, अमर सिंग ने सुब्रतो को, अमिताभ ने अमर सिंग को बडे भैया बनाया फिर पूरा फिल्मी संसार उनका भाई- बहन होने को बेताब हो गया और यह परिवार इतना बडा हो गया कि समझना और जटील हो गया. फिर एक दिन मायावती का पूरे उत्तर प्रदेश में मायाजाल फैल गया. और यह पूरा कुनबा चित हो गया. जब आरबीआई ने शिकंजा कसना शुरू किया तो सुब्रतो ने कांग्रेस की तरफ पिंगे बढाना शुरू कर दिया और राजीव शुक्ला को भाई बना लिया. अमर भैया बुरी तरह चिढ गये. और जब माया मिली न राम (यानी न सेंटर में सत्ता मिली न प्रदेश में) तो मुलायम भैया को भी अपने खून के भाईयो की ही सुननी पडी.

मुझे भी एक अदद ऐसे ही बडे भाई की तलाश हैं. राहुल (गांधी)तुम सुन रहे हो?

बर्थडे

गत वर्ष के आखिरी महिने में मेरा बर्थडे आया और आकर मुझे एक साल और बुढा कर चला गया. यूं तो बुढे होने के चिन्ह तो पहले से ही दिख रहे हैं. पहले सर के पके बाल गिनता था अब दाढी के. बहुत झुंझलाहट सी होती हैं यह सोचकर कि मैं बूढा हो रहा हू. एकाध अपने भावुक दोस्तो ने फोन करके विश किया, बस. मन गया बर्थडे. हालाँकि मैं किसी से कोई अपेक्षा नहीं रखता लेकिन बड़ा अच्छा लगता है अगर कोई मुझे याद करता है. वैसे सालभर लोग पूछेंगें कि मेरा बर्थडे कब है.
खैर. अजीब बात नहीं कि अब इन सारी सुविधायों के बावजूद हम अपने इष्ट मित्रों से संपर्क नहीं कर पाते? फुर्सत ही नहीं, है ना? पहले लोग फोन इसलिए नहीं करते थे कि काल रेट बहुत ज्यादा था. अब जैसे जैसे दरें गिर रहीं हैं फोन करना तो दूर लोग मैसेज करना भी उचित नहीं समझते हैं. शायद कास्ट कटिंग कर रहे होंगें. मंहगाई जो इतनी बढ़ गयी है.

दोस्तों को याद नहीं रहा लेकिन मुझे मोबाइल फोन वाले, इन्सुरेंस वाले, बर्थडे केक बनाने वाले, कपडे बेचने वाले, घड़ी बेचने वाले वगैरह कभी नहीं भूले. उन्होंने मुझे याद किया, मुझे बर्थडे पर विश किया. और क्या चाहिए किसी को? कहते हैं भगवान जब सारे दरवाजे बंद कर देता है तो एक खिद्खी जरूर खोल देता है.