Wednesday, October 7, 2009

दीवाली की शुभकामनायें

दीवाली आ रही है. खूब बम फूटेंगे शोर शराबे मचाने के बाद लोग और भी शोर मचाएंगे जब तक गले में कैंसर ना हो जाए. घर का सारा कचरा सड़क पर रखा जाएगा ताकि लक्ष्मी आकर घर नोटों से भर दें. ताकि जुआ खेला जा सके. दारु पिया जा सके. भाई, एक बात बताओ. अगर सारा माल लक्ष्मी ही रखती हैं तो मुसलमानों को पैसा कौन देता है? शायद दूर से वह देख नहीं पाती होंगी कि सामने वाले का मज़हब क्या है. वैसे मुसलमान भी 'बड़ी दीवाली' मनाते हैं, पूरे साल. हम एक बार मनाते हैं वे आये दिन कहीं ना कहीं मनाते रहते हैं. हम छोटे- छोटे पटाखे फोड़ते हैं उनसे कहाँ मुकाबला?

हिन्दू मानते हैं कि शेषनाग ने पृथ्वी को अपने फन पर उठा रक्खा है. बड़ी नाइंसाफी है. मुसलमानों और इसाईओं का बोझ अपने सर पर क्यूँ ढोते फिर रहे हैं? झटक क्यूँ नहीं देते इन सबों को? हिन्दुओं के पूजा करने का क्या फायदा? खैर, हम लक्ष्मी की बात कर रहे थे जिनके पास खूब माल है. लेकिन घर नहीं. बेचारी क्षीर सागर में खुले आसमान के नीचे रहती हैं. कुछ- कुछ बिहार के बाढ़ग्रस्त इलाकों में रहने वालों के जैसे. और अपने भोले नाथ भी तो कैलाश पर्वत की चोटियों पर अकेले अकेले भंग खाए मदहोश पड़े रहते हैं.

अरे! कोई उन्हें जगाओ भाई.

No comments:

Post a Comment