Friday, October 16, 2009

शुभ दीपावली

प्रिय मित्र गण,
प्रकाश के इस अनूठे और अलौकिक पर्व, दीपावली पर समस्त मित्रों को हार्दिक शुभकामनाएं. ईश्वर आप सब की मनोकामनाएं पूर्ण करें.

सस्नेह आपका,
दीपक

Thursday, October 8, 2009

अगर मैं लड़की होता

अगर मैं लड़की होता तो क्या होता? अव्वल तो मुझे नौकरी जैसी चीज़ नहीं करनी पड़ती. करता भी तो शौकिया. घर बैठे ऐश करता. हज़ार पीछे घूमते, कितने आह भरते. आनलाईन होता तो सैकडो मक्खी की तरह चैट करने के लिए चिपक जाते. बॉस कभी अकड़ कर बात नहीं करता, पगार जल्दी जल्दी बढती; प्रमोशन फ़टाफ़ट मिलता. पालिटिक्स में भी औरतों के लिए अच्छा खासा स्कोप होता है.

मिस वर्ल्ड बनकर फिल्मों में उतरता. रातों रात किस्मत बुलंद हो जाती. जिनको छू देता, तर जाते. लटके झटके दिखा कर टी वी शो तो कर ही लेता. लोग पार्टियों में बुलाते. हीरोईन नहीं तो बिकनी पहन कर आईटम नंबर तो कर ही लेता. कुछ नहीं तो चीयरलीडर्स में अच्छी आमदनी हो जाती. थोडी उम्र ढलने लगती तो किसी बिजनेसमैन को पटा लेता ताकि बुढापा आराम से कट सके. 'एन आर आई' वाला आप्शन तो हमेशा खुला है. मैं लड़की होता तो कोई मामूली लड़की थोड़े होता. आप जानते हैं मेरा मतलब. कितने उद्योगपति और नेतागण ऐसी जानलेवा अदाओं के शिकार हुए हैं.

दो लाख लोग रोज़ मेरा प्रोफाईल निहारते. मीठी मीठी बातें लिखते. अपना दिल स्कैन करके भेजते रहते. हाल चाल लेने और गिफ्ट देने वालों का तांता लगा रहता. आसानी से कारों में लिफ्ट मिल जाती. अभी दो चार लोग मेरे ब्लॉग पर कमेन्ट लिखते हैं, तब हज़ार लोग लिखते. शादी हो जाती तो पति चू **** की तरह काम करता और मैं किटी पार्टियां आयोजित करता. नए नए शौक़ होते मसलन 'इंटीरियर डिजायनिंग' पेंटिंग्स खरीदना वगैरह. अगर किस्मत वहाँ भी साथ नहीं देती तो किसी फ़िल्मी हीरो के घर में 'कामवाली' की नौकरी का बेहतरीन विकल्प तो है ही.

मेरे बड़े भाई साहब आज भी ताना मारते हैं कि मैं एक लड़की नहीं पटा सका. तब ऐसे जहर बुझे ताने तो नहीं सहने पड़ते!!

Wednesday, October 7, 2009

दीवाली की शुभकामनायें

दीवाली आ रही है. खूब बम फूटेंगे शोर शराबे मचाने के बाद लोग और भी शोर मचाएंगे जब तक गले में कैंसर ना हो जाए. घर का सारा कचरा सड़क पर रखा जाएगा ताकि लक्ष्मी आकर घर नोटों से भर दें. ताकि जुआ खेला जा सके. दारु पिया जा सके. भाई, एक बात बताओ. अगर सारा माल लक्ष्मी ही रखती हैं तो मुसलमानों को पैसा कौन देता है? शायद दूर से वह देख नहीं पाती होंगी कि सामने वाले का मज़हब क्या है. वैसे मुसलमान भी 'बड़ी दीवाली' मनाते हैं, पूरे साल. हम एक बार मनाते हैं वे आये दिन कहीं ना कहीं मनाते रहते हैं. हम छोटे- छोटे पटाखे फोड़ते हैं उनसे कहाँ मुकाबला?

हिन्दू मानते हैं कि शेषनाग ने पृथ्वी को अपने फन पर उठा रक्खा है. बड़ी नाइंसाफी है. मुसलमानों और इसाईओं का बोझ अपने सर पर क्यूँ ढोते फिर रहे हैं? झटक क्यूँ नहीं देते इन सबों को? हिन्दुओं के पूजा करने का क्या फायदा? खैर, हम लक्ष्मी की बात कर रहे थे जिनके पास खूब माल है. लेकिन घर नहीं. बेचारी क्षीर सागर में खुले आसमान के नीचे रहती हैं. कुछ- कुछ बिहार के बाढ़ग्रस्त इलाकों में रहने वालों के जैसे. और अपने भोले नाथ भी तो कैलाश पर्वत की चोटियों पर अकेले अकेले भंग खाए मदहोश पड़े रहते हैं.

अरे! कोई उन्हें जगाओ भाई.