Friday, September 18, 2009

प्रसादम् देहि

कल अजीब बात हुई. एक रेस्तरां में बैठा खाना खा रहा था और टीवी पर टाटा टी का विज्ञापन चल रहा था जिसमें 'चाय- पानी' यानी घूस के खिलाफ मुहीम चलाया जाता है- "ये (भ्रष्ट नेता और बाबू) खाते हैं क्यूंकि हम इन्हें खिलाते हैं. खिलाना बंद करो, पिलाना शुरू करो". मैं सोच ही रहा था की क्या इस विज्ञापन से कोई बदलाव आ पा आएगा? इत्तेफाक से तभी पुलिस की एक गाडी वहाँ रुकी. चुपके से रेस्तरां के मालिक ने सौ का एक नोट गाडी में बैठे एक पुलिस वाले को पकडा दिया. ऐसा आसपास के कुछ और दुकानदारों ने भी किया. बाद में उसने मुझे बताया की ऐसी कई गाडियां आती हैं. दिन की अलग और रात के लिए अलग गाडियां हैं. हर बार एक नया पुलिसवाला आता है और हर पुलिसवाले को 'प्रसाद' चाहिए होता है. यह तो बोनस है. ये लोग हर महीने 'बड़े साहब लोगों' को पांच हज़ार का प्रसाद पहले ही चढा आते हैं. लेकिन ये लोग ऐसा क्यूँ करते हैं? क्यूंकि महाडा के रिहायशी इलाकों में रेस्तरां खोलना गैरकानूनी है और इसकी पेनाल्टी बारह हज़ार है.

इस घटना से मुझे इलाहाबाद की दो घटनाएं याद हो आयीं. एक बार मैं अपने एक पुलिस आफिसर दोस्त के साथ कहीं से आ रहा था. रास्ते में अचानक एक ट्रक रूका और उसमें से एक पुलिसवाला गालियाँ बकता हुआ उतरा. मेरा दोस्त ठहाके लगाने लगा. मैंने कारण पूछा तो उसने कहा "भाई साहब को प्रसाद नहीं मिला. उसके कागजाद सही रहे होंगे सो उसने इनकार कर दिया. दरअसल हम पुलिसवाले खुद नहीं चाहते की लोग नियम से चलें".

दूसरी घटना थोडी मार्मिक है. मैं राजरूपपुर के तिराहे पर खडा था. वहाँ एक पुलिसवाला चंदा वसूल रहा था. रिक्शेवाले तेजी से भाग जा रहे थे. जो पकडे जाते थे उनको 'खुरचन' देना पड़ता था. जो कुछ चालाक थे दूर से एक रूपये का सिक्का फ़ेंक दे रहे थे. वह दृश्य आज भी मेरे जेहन में है और मैं जब भी पुलिसवालों को देखता हूँ उनके प्रति मेरी श्रद्धा और करुना और भी बढ़ जाती है.

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