आजकल 'डूड' कहने और कहलाने का चलन है. लड़कियां 'बेब' कहलाना पसंद करती हैं. एक समय था जब लड़कियों के नाम के आगे 'देवी' लगाकर सम्मान दिया जाता था. अब किसी को जरा देवी कह कर तो देखो. शहर में रहकर थोडा शहरीकरण हो गया है. वरना अभी भी मन से देहाती ही हूँ. गाँव वाले 'बम्बईया' कहते हैं और यहाँ के लोग 'देहाती' समझते हैं. ना गोंद लगाकर बालों को कौए का घोंसला बनाकर घूमता हूँ. ना टट्टू बनवाया कभी. कैफे काफी डे में बैठकर बेकार में ना गुफ्तगू करता हूँ. ना तो किसी दारू का नाम पता है. ना किसी क्लब का कभी मुंह देखा. ना इत्रों का शौक़ है. ना सरकता जींस पहनता हूँ ताकि किस ब्रांड का अंडर वीयर पहना है लोग मालूम कर लें.
यह बात समझ में क्यूँ नहीं आती की आधुनिकता विचारों से आती है. चमाचम जूते और अच्छे कपडे पहन लेने से मन का विकास नहीं होता. लेकिन अब इन्हें कौन समझाए? 'आई फोन' वाला साधारण फोन वाले को तुच्छ समझता है. 'मर्सीडीज़' वाला 'मारुती' वाले को पिछडा समझता है. अब अमरीकी संस्कार हमारे बच्चों में प्रतिस्फूटित हो रहे हैं तो आगे स्तिथि कितनी भयावह होगी इसकी परिकल्पना मैं नहीं करना चाहता. लेकिन इतना तय है की एक दिन आएगा जब अमरीकी हमें योग सीखाएँगे, गीता और रामायण का पाठ कराएँगे. और हम उनसे सीखेंगे की सुख पूर्वक कैसे जीया जाता है.
सादगी का जमाना ही नहीं रहा. अब यह सब गंवारपन लगता है.
Hope
8 years ago

sidha hona bhi PAAP hai...
ReplyDeleteविचारणीय आलेख!
ReplyDelete