Thursday, September 3, 2009

धीरुभाई धरती पर

श्रद्धेय धीरुभाई घूस देने और मसखरा लगाकर काम निकलवाने में बड़े उस्ताद माने जाते थे. जाहिर है स्वर्ग में जाकर आदतें बदल तो जायेंगीं नहीं? सो, एक दिन भगवान के सेक्रेटरी को पटा कर तीन दिन की छुट्टी पर धरती पधारे.

सीधे कोकिलाबेन के पास गए जहाँ उन्होंने उनको खूब लताडा: "शर्म नथी? ढोंगी? थारी औकात जो. डुप्लीकेट कहीं का. मारो वर बनवानी सपनो जो" (हिंदी में- शर्म नहीं आती? ढोंगी? अपनी औकात तो देख. डुप्लीकेट कहीं का. मेरा पति बनने का ख़्वाब देख रहा है).

थोड़े उदास मुकेश के पास गए. तो मुकेश ने भी खूब खरी खोटी सुनाई. "ओये बुड्ढे! तेरा भेंज़ा फिर गया है क्या? माना की मेरे बाप की शक्ल तेरे इस मनहूस शक्ल से मिलती है. तो? देख, यह अनिल का बच्चा पहले से ही मेरी जान के पीछे हाथ धोकर बैठा है. अब तू तो मेरा सर मत खा. गार्ड, भगा इसे यहाँ से".

अनिल ने जब अपने भाई की शिकायत सुनी तो थोडी हमदर्दी हुई "हूँ. सबूत क्या है की तू मेरा बाप है?" फिर अचानक भड़क पड़े. "और है भी तो क्या लेने आया है अब? साला, बिना वसीयत के ही मर गया. उसी का नतीजा भुगत रहा हूँ अभी तक. थोडा रूककर नहीं मर सकता था?"

धीरूभाई करुण स्वर में बोले: बेटा, मौत पूछकर थोड़े आती है".

फिर अनिल के दिमाग में खूंखार विचार आने लगे की कैसे इसकी पब्लिसिटी करके फायदा उठाया जा सकता है और भाई को बदनाम किया जा सकता है. लेकिन उनके कानूनी सलाहकारों ने राय दी की कानून के नज़रों में धीरुभाई मर चुके हैं. और इस पब्लिसिटी के बदले वे हंसी के पात्र बन सकते हैं. बेचारे धीरुभाई जो अखबारों में अपना बड़ा बड़ा फोटो देखकर अपने प्रिय बेटों के अगाध प्रेम से भावविव्हल हो जाते थे, पहले ही दिन स्वर्ग वापस लौट गए.

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