Thursday, September 24, 2009

आदमी और कुत्ता

मेरी गली में चार पांच कुत्ते रहते हैं जिन्हें मैं रोज़ बिस्किट खिलाता हूँ. और लोग भी खिलाते हैं लेकिन मैं जितना खिलाता हूँ वो हमेशा खाने को तैयार बैठे रहते हैं. गोया उनका पेट कभी भरता ही ना हो. सब आपस में इस बात की प्रतियोगिता करते हैं कि कौन सबसे ज्यादा दुम हिला सकता है. एक कुत्ते को मैंने देखा है. वो बाकी कुत्तों पर धौंस जमाने की कोशिश करता है और मुझे यह जताने की कोशिश करता है कि वो सबसे ज्यादा वफादार है. ताकि वो सबसे ज्यादा दुम हिलाने का श्रेय पा सके और सबसे ज्यादा बिस्किट खा सके. कुछ दिन मैंने बिस्किट खिलाना बंद करके भी देखा. उन्होंने मेरी ओर देखना भी बंद कर दिया. शायद उन्हें लगा हो कि मैं अब किसी काम का नहीं रहा.

अजीब बात है कि कुत्तों में भी इंसानी आदतें पनप रही है.

Tuesday, September 22, 2009

डूड

आजकल 'डूड' कहने और कहलाने का चलन है. लड़कियां 'बेब' कहलाना पसंद करती हैं. एक समय था जब लड़कियों के नाम के आगे 'देवी' लगाकर सम्मान दिया जाता था. अब किसी को जरा देवी कह कर तो देखो. शहर में रहकर थोडा शहरीकरण हो गया है. वरना अभी भी मन से देहाती ही हूँ. गाँव वाले 'बम्बईया' कहते हैं और यहाँ के लोग 'देहाती' समझते हैं. ना गोंद लगाकर बालों को कौए का घोंसला बनाकर घूमता हूँ. ना टट्टू बनवाया कभी. कैफे काफी डे में बैठकर बेकार में ना गुफ्तगू करता हूँ. ना तो किसी दारू का नाम पता है. ना किसी क्लब का कभी मुंह देखा. ना इत्रों का शौक़ है. ना सरकता जींस पहनता हूँ ताकि किस ब्रांड का अंडर वीयर पहना है लोग मालूम कर लें.

यह बात समझ में क्यूँ नहीं आती की आधुनिकता विचारों से आती है. चमाचम जूते और अच्छे कपडे पहन लेने से मन का विकास नहीं होता. लेकिन अब इन्हें कौन समझाए? 'आई फोन' वाला साधारण फोन वाले को तुच्छ समझता है. 'मर्सीडीज़' वाला 'मारुती' वाले को पिछडा समझता है. अब अमरीकी संस्कार हमारे बच्चों में प्रतिस्फूटित हो रहे हैं तो आगे स्तिथि कितनी भयावह होगी इसकी परिकल्पना मैं नहीं करना चाहता. लेकिन इतना तय है की एक दिन आएगा जब अमरीकी हमें योग सीखाएँगे, गीता और रामायण का पाठ कराएँगे. और हम उनसे सीखेंगे की सुख पूर्वक कैसे जीया जाता है.

सादगी का जमाना ही नहीं रहा. अब यह सब गंवारपन लगता है.

Friday, September 18, 2009

प्रसादम् देहि

कल अजीब बात हुई. एक रेस्तरां में बैठा खाना खा रहा था और टीवी पर टाटा टी का विज्ञापन चल रहा था जिसमें 'चाय- पानी' यानी घूस के खिलाफ मुहीम चलाया जाता है- "ये (भ्रष्ट नेता और बाबू) खाते हैं क्यूंकि हम इन्हें खिलाते हैं. खिलाना बंद करो, पिलाना शुरू करो". मैं सोच ही रहा था की क्या इस विज्ञापन से कोई बदलाव आ पा आएगा? इत्तेफाक से तभी पुलिस की एक गाडी वहाँ रुकी. चुपके से रेस्तरां के मालिक ने सौ का एक नोट गाडी में बैठे एक पुलिस वाले को पकडा दिया. ऐसा आसपास के कुछ और दुकानदारों ने भी किया. बाद में उसने मुझे बताया की ऐसी कई गाडियां आती हैं. दिन की अलग और रात के लिए अलग गाडियां हैं. हर बार एक नया पुलिसवाला आता है और हर पुलिसवाले को 'प्रसाद' चाहिए होता है. यह तो बोनस है. ये लोग हर महीने 'बड़े साहब लोगों' को पांच हज़ार का प्रसाद पहले ही चढा आते हैं. लेकिन ये लोग ऐसा क्यूँ करते हैं? क्यूंकि महाडा के रिहायशी इलाकों में रेस्तरां खोलना गैरकानूनी है और इसकी पेनाल्टी बारह हज़ार है.

इस घटना से मुझे इलाहाबाद की दो घटनाएं याद हो आयीं. एक बार मैं अपने एक पुलिस आफिसर दोस्त के साथ कहीं से आ रहा था. रास्ते में अचानक एक ट्रक रूका और उसमें से एक पुलिसवाला गालियाँ बकता हुआ उतरा. मेरा दोस्त ठहाके लगाने लगा. मैंने कारण पूछा तो उसने कहा "भाई साहब को प्रसाद नहीं मिला. उसके कागजाद सही रहे होंगे सो उसने इनकार कर दिया. दरअसल हम पुलिसवाले खुद नहीं चाहते की लोग नियम से चलें".

दूसरी घटना थोडी मार्मिक है. मैं राजरूपपुर के तिराहे पर खडा था. वहाँ एक पुलिसवाला चंदा वसूल रहा था. रिक्शेवाले तेजी से भाग जा रहे थे. जो पकडे जाते थे उनको 'खुरचन' देना पड़ता था. जो कुछ चालाक थे दूर से एक रूपये का सिक्का फ़ेंक दे रहे थे. वह दृश्य आज भी मेरे जेहन में है और मैं जब भी पुलिसवालों को देखता हूँ उनके प्रति मेरी श्रद्धा और करुना और भी बढ़ जाती है.

लौंडीयाबाजी

अब तक तो आप समझ ही चुके होंगे की मेरे पास कोई काम धाम नहीं है. और ये भी की मेरे दिमाग में कितना कचरा भरा है. लेकिन खुदा कसम जो मैंने किसी के साथ कोई बदतमीजी की हो. कभी किसी लड़की को आँख नहीं मारी या सिटी नहीं बजाई (यह बात और है की ऐसी तबियत कई बार हुई).

तो आप किस्मत में यकीन नहीं करते हैं? फिर इसे आप और क्या कहेंगें पिछले बीस सालों में कभी भी कोई खूबसूरत लड़की मेरे बगल में आकर नहीं बैठी? खड़ी होकर सफ़र कर लेगी पर मेरे बगल में नहीं बैठेगी. भला हो उस नशेड़ी ड्राइवर का और सड़क बनाने वालों का. अगर ऐसे खूबसूरत गड्ढे नहीं होते तो मैं इस जन्म में नारी स्पर्श से वंचित ही रह जाता.

ट्रेन में चढ़ने से पहले सबसे पहले रिजर्वेशन लिस्ट पर निगाह दौडाता हूँ काश कोई खूबसूरत परी मेरे साथ सफ़र करे. कोई खूबसूरत हमसफ़र हो तो सफ़र का पता ही नहीं चलता. फिर चाहे ट्रेन एक के बदले चार दिन क्यूँ ना ले ले. ज़रा से भी शिकन नहीं आती. खूबसूरती को आत्मसात करके जो परमानन्द प्राप्त होता है वह किसी स्वर्गीक अनुभव से कतई कम नहीं होता. मेरा दुर्भाग्य देखिये की हमेशा खडूस बुड्ढे या पायरिया ग्रस्त आंटियां ही मेरे साथ सफ़र करती हैं. स्लीपर क्लास से एसी थ्री फिर एसी टू में भी सफ़र किया. यहाँ तक की हवाई जहाज में भी चढ़ लिया मगर ऐसा सुअवसर प्राप्त नहीं हुआ.

पाठक समझेगें की मैं बड़ा रसीक किसिम का इंसान हूँ या लौंडीयाबाजी की गन्दी गन्दी बातें करता हूँ. भई सिर्फ बातें ही तो करता हूँ. मैंने ना तो नाज़नीनों के कपडे चुराए ना किसी स्त्री का चीरहरण किया. यही काम कृष्ण ने किये तो आपने कहा प्रभु लीला कर रहे हैं. और आप खामखा मुझे तोहमत दे रहे हैं? यह तो सरासर नाइंसाफी है भाई.

Wednesday, September 16, 2009

गुलज़ार

अब तक मैंने सिर्फ एक ही शख्स का ऑटोग्राफ लिया है. जिसका नाम सम्पूर्णानन्द सिंह है और जिसे आप गुलज़ार के नाम से जानते हैं. बड़ा सनकी और जुनूनी नासिख (लेखक) है. एक तो शायर ऊपर से सरदार. कभी दिल निचोड़ने लगता है तो कभी जिगर की आग से बीडी जलाने लगता है. कुछ भी लिखता है. जिसका ना ओर ना छोर. कभी उसके पाँव सपनों पर पड़ जाते हैं कभी वह बड़े बड़े कोयले से फलक पर नाम लिखता है, कभी उसका मन होम होम करने लगता है, कभी सात रंग के सपने बुनता है, कभी 'लकडी की काठी का घोड़ा' बन जाता है, कभी कागज़ की कश्ती खेने बचपन में लौट जाता है. कभी इश्क में छैयां छैयां करता है, कभी भेंजे में गोली मारने की बात करता है. जो तिनको के नशेमन में रहता है और शीशे का घरौदा तैयार करता है. जो अकेला शहर में आबदाना ढूंढता है. जो 'बाबू मोशाय' बनकर रुलाता है जो 'अंगूर' में गुदगुदाता है.

'मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है' लिखकर जब ले गया तो पंचम ने डाटा "कल को तू अखबार लेकर आएगा और कहेगा कम्पोज़ कर?"

कहा ना? कुछ भी लिखता है. कुछ भी. सच, तुम जैसों के बाद तो हिंदी फिल्मों का संगीत गूंगा हो जायेगा.

Friday, September 11, 2009

ऐसा देश है मेरा

कृपया अब आप जो पढने जा रहे हैं उसे कोई कहानी या चुटकुला समझकर मत पढें. एक बार भारतवर्ष के एक कवि विदेश यात्रा पर गए. वहां 'शुद्ध दूध' की तलाश में दिन भर भटकने के बाद उन्होंने एक दूधवाले से मायूसी से कहा "कैसा देश है जहां 'शुद्ध दूध' तक नहीं मिलता". उसने हैरानी से पूछा "दूध तो मालूम है पर 'शुद्ध दूध' क्या होता है?". कवि महोदय ने उत्तर में कहा "अरे दूध जिसमें पानी ना मिलाया गया हो". फिर दूधवाले ने अचम्भे से पूछा "भला, दूध में पानी भी मिलाया जाता है?".

ऐसा है अपना देश. गया जमाना जब हम दूध में पानी मिलाया करते थे. हमने इतनी तरक्की कर ली है कि यूरिया और केमिकल्स से दूध बना सकें. यह दुखद है हमारी इस उपलब्धि, इस शोध और अनुसन्धान को दुनिया मान्यता नहीं देती. हमें इसका प्रचार प्रसार करना चाहिए. इस विधा को विकसित देशों में ले जाया जाना चाहिए कि देखो कैसे हम बिना दूध मलाई के घी बना सकते हैं. आने दिनों में जब अकाल और खाने पीने की किल्लत होगी तो भारत ही एकमात्र देश होगा जो अन्नपूर्णा की तरह समस्त विश्व को दूध और घी से सराबोर कर देगा.

मेरी मम्मी कहती हैं कि दूध एक सम्पूर्ण भोजन है. लेकिन वह दूध मिलता कहाँ है? कीमतें आसमान छू रही हैं. जो चीज़ें उपलब्ध भी हैं उनमें जहर है. जरा सोचिये की खाएं तो क्या पीयें तो क्या? पीने का पानी, दारू, सब्जियाँ, फल यहाँ तक की नोट भी नकली हैं. और हमारी सरकारें चैन की नींद सोती हैं. वैसे एक सरल उपाय है. हमें कंकड़ पत्थर चबाना शुरू कर देना चाहिए. देश में प्रचुर मात्र में वे उपलब्ध हैं. फिर कंकड़ पत्थर में कोई भला क्या मिला सकेगा? पीने के लिए सरकार भले पानी ना उपलब्ध करा सके पर मुझे पक्का यकीन की वह चरस, गंजा, अफीम, बीडी, सिगरेट इत्यादि की कमी कभी नहीं होने देगी.

जय हिंद, जय नेतागण, जय भारतवासी.

Thursday, September 10, 2009

शिकायत

खुदा से मुझे बहुत शिकायत है. किसी रोज अगर मुलाक़ात हो तो मैं जमकर शिकायत करुँ. आखिर उन्होंने मुझे यूँ लापरवाही से जल्दीबाजी में क्यूँ बनाया? कहीं से भी बचा खुचा मटेरिअल उठाया और एक 'दीफेकटेड पीस' तैयार कर दिया.
अगर आलसी और कामचोर ही बनाना था तो क्यूँ भेज दिया एक गरीब ब्राम्हण के घर? बनाना था कहीं का प्रिंस या अरब का शेख? किसी शायर की तड़पती आत्मा को मेरे भेंजे में ठूंस दिया और कहा जा बेटा नौकरी कर, वो भी शेयर मार्केट में जहां मेहता, पारेख, शाह, पटेल और मारवाडियों से घिरा मैं असुरक्षित महसूस करता हूँ. "माल लाओ", "सौदा", "टका" जैसे शब्द मानो कवि की कल्पना का बलात्कार कर बैठते हों. मुझे भी किसी गुजराती के घर पैदा करा दिया होता?

इन गुजरातियों और मारवाडियों को बस एक ही भाषा समझ में आती है- पैसा. इनको क्या की शेक्सपियर का लिख गए और बाबर कौन सी खेत की मूली था या चन्द्रगुप्त/ समुद्रगुप्त किस चिडिया का नाम था? समुद्रगुप्त तो उन्हें समुद्र में गड़ा कोई गुप्त खजाना ही लगेगा. अब ऐसे 'दिमाग से पैदल' लोगों से पाला पडवा ही दिया है तो कुछ पैसा कमाने का आईडिया भी देता?

यारों, यह खुदा भी बड़ी काईयाँ चीज़ है. अपनी मस्ती के लिए मेरी लाइफ का तो गेम ही बजा डाला.

Friday, September 4, 2009

मुंबई किसकी?

हैरानी की बात है कि चाचा- भतीजा दोनों अभी तक खामोश बैठे हैं. कोई हंगामा नहीं, कोई फसाद नहीं? अरे भाई, 'इलेक्शन' सर पर है, अभी नहीं तो कभी नहीं. पिछली बार तो बहुत हो हल्ला मचाये थे कि मुंबई हमारी है. इस बार क्या हो गया?

अब जिक्र आया है तो बताते चलें कि राजू, यह मुंबई ना तुम्हारी है, ना हमारी. अगर इतिहास पढ़े होते तो पता चलता कि मुंबई अंग्रेजों की है. 1661 में मुग़लों ने मुंबई को चार्ल्स द्वितीय को दहेज़ में दे दिया था जब उसने कैथरीन ऑफ़ ब्रेगंज़ा से शादी की. अब दूसरे के दहेज़ की चीज़ पर क्यूँ हाथ साफ़ करते हो?

अब मुंबई में रहना है तो बोलो- जय इंग्लैंड. जय विक्टोरिया.

Thursday, September 3, 2009

धीरुभाई धरती पर

श्रद्धेय धीरुभाई घूस देने और मसखरा लगाकर काम निकलवाने में बड़े उस्ताद माने जाते थे. जाहिर है स्वर्ग में जाकर आदतें बदल तो जायेंगीं नहीं? सो, एक दिन भगवान के सेक्रेटरी को पटा कर तीन दिन की छुट्टी पर धरती पधारे.

सीधे कोकिलाबेन के पास गए जहाँ उन्होंने उनको खूब लताडा: "शर्म नथी? ढोंगी? थारी औकात जो. डुप्लीकेट कहीं का. मारो वर बनवानी सपनो जो" (हिंदी में- शर्म नहीं आती? ढोंगी? अपनी औकात तो देख. डुप्लीकेट कहीं का. मेरा पति बनने का ख़्वाब देख रहा है).

थोड़े उदास मुकेश के पास गए. तो मुकेश ने भी खूब खरी खोटी सुनाई. "ओये बुड्ढे! तेरा भेंज़ा फिर गया है क्या? माना की मेरे बाप की शक्ल तेरे इस मनहूस शक्ल से मिलती है. तो? देख, यह अनिल का बच्चा पहले से ही मेरी जान के पीछे हाथ धोकर बैठा है. अब तू तो मेरा सर मत खा. गार्ड, भगा इसे यहाँ से".

अनिल ने जब अपने भाई की शिकायत सुनी तो थोडी हमदर्दी हुई "हूँ. सबूत क्या है की तू मेरा बाप है?" फिर अचानक भड़क पड़े. "और है भी तो क्या लेने आया है अब? साला, बिना वसीयत के ही मर गया. उसी का नतीजा भुगत रहा हूँ अभी तक. थोडा रूककर नहीं मर सकता था?"

धीरूभाई करुण स्वर में बोले: बेटा, मौत पूछकर थोड़े आती है".

फिर अनिल के दिमाग में खूंखार विचार आने लगे की कैसे इसकी पब्लिसिटी करके फायदा उठाया जा सकता है और भाई को बदनाम किया जा सकता है. लेकिन उनके कानूनी सलाहकारों ने राय दी की कानून के नज़रों में धीरुभाई मर चुके हैं. और इस पब्लिसिटी के बदले वे हंसी के पात्र बन सकते हैं. बेचारे धीरुभाई जो अखबारों में अपना बड़ा बड़ा फोटो देखकर अपने प्रिय बेटों के अगाध प्रेम से भावविव्हल हो जाते थे, पहले ही दिन स्वर्ग वापस लौट गए.