बेकारी में खाली बैठे बैठे पॉलिटिक्स ज्वाइन करने का ख्याल आया. सोचा कोशिश करने में हर्ज़ ही क्या है? सबसे पहले सोनिआजी के पास गया. क्यूँ ना सबसे पुरानी पार्टी को ज्वाइन करुँ? वहाँ का दृश्य देखकर दिल दहल गया. एक तरफ अर्जुन सिंह राहुल बाबा के कपडे इस्त्री कर रहे थे दूसरी तरफ सोनीजी सोफा ठीक कर रहीं थीं. सब लोग इसी प्रकार अपने आप को व्यस्त रख रहे थे. सोनियाजी ब्रश करके निवृत्त हुईं नहीं कि टावेल हाज़िर. चाय का कप टेबल पर रखने तक की जहमत नहीं उठानी पड़ रही थी. मेरे लायक कोई काम बचा ही नहीं था. उनके पैर चूने के लिए भी लाइनें लगीं थीं. सो, उलटे पों लौट आया.
सोचा राजनाथ से मिलूँ. जब यू पी में शिक्षा मंत्री थे तो लाखों क्षात्रों को फेल करवाया था, मैं बस फेल होते होते रहा गया. फिर भी मन मार कर पहुंचा. उनका पहला सवाल था-
"काम क्या करते हो?"
"जी अभी तो बेरोजगार हूँ."
"पार्टी में अभी छंटनी चल रही है. कोस्ट कटिंग हो रही है".
"मैं फ्री में आ जाऊँगा".
"काम क्या करोगे?"
"जो आप कहेंगें".
"यही तो समस्या है कि कोई काम ही नहीं है".
अचानक उनकी नज़र मेरे पॉकेट के कलम पर गयी. डाँटते हुए पूछा-
"लिखने विखने का काम तो नहीं करते हो?"
"नहीं जी.वो तो दस्खत करने के लिए है" मैं झूठ बोल गया.
वे इत्मीनान हो गए.
"सोचना पड़ेगा. पार्टी हाई कमान कि अगली चिंतन बैठक में कोई निर्णय लिया जा सकेगा. तब तक कहीं और ट्राई मार लो".
फिर वहाँ से निकलते ही काफी होउस गया जहां प्रकाश कारत चुस्कियां ले रहे थे. मैंने कहा-
"सर, आप यहाँ?".
वो खिन्न होकर बोले "तो और कहाँ जाऊँ?"
"नहीं नहीं. मेरा मतलब आप आजकल दीखते नहीं. ना अखबारों में ना टीवी पर ही. तो क्या हो रहा है आजकल? कोई किताब विताब ही लिख डालिए खाली टाइम में." जुबान फिसल चुकी थी.
"हमारी पार्टी में लिखने का काम नहीं होता. हम सिर्फ विरोध करते हैं. धरना प्रदर्शन करते हैं हम. किताब लिखना आता तो कोई बड़ी पार्टी ज्वाइन करते. वैसे बीजेपी से ऑफर आया था लेकिन डिस-क्वालिफाईड हो गया. वही सोच रहा हूँ कि क्या किया जाए".
"हाँ, वैसे हु जिंताओ (चीन के प्रेसिडेंट) के रिटायर होने में अभी काफी टाइम है, नहीं तो आप वहाँ भी ट्राई कर लेते". जुबान ने फिर धोखा दे दिया था. उनके रिएक्शन का इंतज़ार किया बिना मैं वहाँ से भाग लिया.
फिर मायावती के यहाँ हो आया. उन्होंने पूछा" कितना देगा?"
"क्या कितना देगा?"
"अरे, चंदा और क्या?". पार्टी ज्वाइन करने की पहली शर्त उनके बर्थ- डे फंड में चंदा करना होता है, उनके पीऐ ने बताया.
"मैं तो बेरोजगार हूँ . ."
"तो सपा ज्वाइन कर ले" और उनकी आवाज़ और भी फट गयी.
अमर सिंह ने समझाया " अरे भाई, यह तो फिल्म स्टार्स कि पार्टी है. तू कहाँ भटक गया इधर?"
शिव सेना और मनसे के लीडरों के गेट पर बड़ा बड़ा लिखा पाया-
उत्तर भारतीयों का प्रवेश वर्जित.
पॉलिटिक्स अपने बस की है ही नहीं. ना चापलूसी करनी आती है, ना जुबान पे लगाम है, ना जुलूस निकालने आता है और ना ही बसों में आग लगाने की कूव्वत ही है. सच में मुझे योग्य लोगों के हाथों में ही देश को सुरक्षित सौपं देना चाहिए.
सो, इस प्रकार पॉलिटिक्स ज्वाइन करने का इरादा देश हित में त्याग दिया.
Hope
8 years ago

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