Thursday, August 27, 2009

मेरा नेता बनते बनते रह जाना

बेकारी में खाली बैठे बैठे पॉलिटिक्स ज्वाइन करने का ख्याल आया. सोचा कोशिश करने में हर्ज़ ही क्या है? सबसे पहले सोनिआजी के पास गया. क्यूँ ना सबसे पुरानी पार्टी को ज्वाइन करुँ? वहाँ का दृश्य देखकर दिल दहल गया. एक तरफ अर्जुन सिंह राहुल बाबा के कपडे इस्त्री कर रहे थे दूसरी तरफ सोनीजी सोफा ठीक कर रहीं थीं. सब लोग इसी प्रकार अपने आप को व्यस्त रख रहे थे. सोनियाजी ब्रश करके निवृत्त हुईं नहीं कि टावेल हाज़िर. चाय का कप टेबल पर रखने तक की जहमत नहीं उठानी पड़ रही थी. मेरे लायक कोई काम बचा ही नहीं था. उनके पैर चूने के लिए भी लाइनें लगीं थीं. सो, उलटे पों लौट आया.

सोचा राजनाथ से मिलूँ. जब यू पी में शिक्षा मंत्री थे तो लाखों क्षात्रों को फेल करवाया था, मैं बस फेल होते होते रहा गया. फिर भी मन मार कर पहुंचा. उनका पहला सवाल था-
"काम क्या करते हो?"
"जी अभी तो बेरोजगार हूँ."
"पार्टी में अभी छंटनी चल रही है. कोस्ट कटिंग हो रही है".
"मैं फ्री में आ जाऊँगा".
"काम क्या करोगे?"
"जो आप कहेंगें".
"यही तो समस्या है कि कोई काम ही नहीं है".
अचानक उनकी नज़र मेरे पॉकेट के कलम पर गयी. डाँटते हुए पूछा-
"लिखने विखने का काम तो नहीं करते हो?"
"नहीं जी.वो तो दस्खत करने के लिए है" मैं झूठ बोल गया.
वे इत्मीनान हो गए.
"सोचना पड़ेगा. पार्टी हाई कमान कि अगली चिंतन बैठक में कोई निर्णय लिया जा सकेगा. तब तक कहीं और ट्राई मार लो".

फिर वहाँ से निकलते ही काफी होउस गया जहां प्रकाश कारत चुस्कियां ले रहे थे. मैंने कहा-
"सर, आप यहाँ?".
वो खिन्न होकर बोले "तो और कहाँ जाऊँ?"
"नहीं नहीं. मेरा मतलब आप आजकल दीखते नहीं. ना अखबारों में ना टीवी पर ही. तो क्या हो रहा है आजकल? कोई किताब विताब ही लिख डालिए खाली टाइम में." जुबान फिसल चुकी थी.
"हमारी पार्टी में लिखने का काम नहीं होता. हम सिर्फ विरोध करते हैं. धरना प्रदर्शन करते हैं हम. किताब लिखना आता तो कोई बड़ी पार्टी ज्वाइन करते. वैसे बीजेपी से ऑफर आया था लेकिन डिस-क्वालिफाईड हो गया. वही सोच रहा हूँ कि क्या किया जाए".
"हाँ, वैसे हु जिंताओ (चीन के प्रेसिडेंट) के रिटायर होने में अभी काफी टाइम है, नहीं तो आप वहाँ भी ट्राई कर लेते". जुबान ने फिर धोखा दे दिया था. उनके रिएक्शन का इंतज़ार किया बिना मैं वहाँ से भाग लिया.

फिर मायावती के यहाँ हो आया. उन्होंने पूछा" कितना देगा?"
"क्या कितना देगा?"
"अरे, चंदा और क्या?". पार्टी ज्वाइन करने की पहली शर्त उनके बर्थ- डे फंड में चंदा करना होता है, उनके पीऐ ने बताया.
"मैं तो बेरोजगार हूँ . ."
"तो सपा ज्वाइन कर ले" और उनकी आवाज़ और भी फट गयी.

अमर सिंह ने समझाया " अरे भाई, यह तो फिल्म स्टार्स कि पार्टी है. तू कहाँ भटक गया इधर?"
शिव सेना और मनसे के लीडरों के गेट पर बड़ा बड़ा लिखा पाया-
उत्तर भारतीयों का प्रवेश वर्जित.

पॉलिटिक्स अपने बस की है ही नहीं. ना चापलूसी करनी आती है, ना जुबान पे लगाम है, ना जुलूस निकालने आता है और ना ही बसों में आग लगाने की कूव्वत ही है. सच में मुझे योग्य लोगों के हाथों में ही देश को सुरक्षित सौपं देना चाहिए.

सो, इस प्रकार पॉलिटिक्स ज्वाइन करने का इरादा देश हित में त्याग दिया.

'शोर्ट कट' का है जमाना

लोग कहते हैं एक पैराग्राफ में अपनी बात लिखो? लेकिन कैसे संभव है? क्या उपन्यास को एक पेज में लिखा जा सकता है? लेकिन भाई, फास्ट फ़ूड का जमाना है सबको जल्दी मची है. कभी कभी सोचता हूँ कल की नस्ल क्या पेशाब करने के लिए 'सुलभ शौचालय' जायेगी या पैंट में ही करा करेगी? आजकल प्यार भी ऐसे ही हो रहा है. "ऐ, जल्दी पटती है तो पट वरना कलटी मार, अपुन के पास ज्यादा टाइम नहीं है". टेस्ट मैच से वन डे फिर ट्वेंटी ट्वेंटी तक आ गए. अब क्या टॉस करवा के ही मैच जितवा दोगे?

एक संघर्षरत युवक कुछ वर्ष पहले मेरे पीछे पड़े थे. हरियाणा से इंजीनियरिंग करके आये थे. मार्शल आर्ट्स में बड़े निपुण थे और बार बार अक्षय कुमार को पटखनी देने की बात करते थे. जल्दी से 'सुपर स्टार' बन जाना चाहते थे. मैंने कहा भाई, किसी ऐसे वैसों को पकडो जिनकी कोई कंवारी बेटी या बहन हो. उसे पता लो फिर हीरो बन ही जाओगे. यही सबसे शोर्ट कट है. फिर पूछने लगे कि किसे पताऊँ? मैंने कहा "सलमान की एक बहन अभी खाली है, किस्मत आजमा सकते हो". अक्सर फ़ोन करके मुझे परेशान करते रहते थे. किस डिरेक्टर की बेटी या बहन जवान हो रही है क्या मैं यही हिसाब करता फिर रहा हूँ? एक दिन पूछने लगे की करण जौहर के यहाँ दाल गल सकती है? क्यूँ? शाहरुख़ क्या इतना बूढा हो गया है? खैर.

लोग करें भी तो क्या? एक दौर था जब टिकेट ब्लैक करने वाले, बस कंडक्टर, झाडू मारनेवाला कोई भी हीरो बन जाता था. कुछ लोग तो हीरोइनों का छाता इसी उम्मीद में ही ढोया करते थे और कामयाब भी हुए. प्रतिस्पर्धा इतनी बढ़ गयी है और आप अभी भी 'कास्टिंग काउच' से घबरा जाते हैं? अब तो हीरोइनें ना तो नदी में डूबती हैं ना सेट पर आग ही लगती है. अब कोई देवानंद या सुनील दत्त कैसे बने?

जेल यात्रा

जेल जाना हर किसी के लिए बेहद जरूरी है. मेरे ख्याल में यह हज जाने या गंगा नहाने से कम नहीं. अगर मन की शांति चाहिए तो जेल जाओ. कामचोरी करके मुफ्त खाना है तो जेल जाओ. यहाँ विभिन्न पेशे से आये लोगों का महासंगम होता है. फिल्म अभिनेता, नेता, व्यवसायी वर्ग, चोर उचक्के सभी. जहां साम्यवाद और समाजवाद का अनोखा उदाहरण मिलता है. जहां दुनिया के मायावी इंद्रजाल से दूर आत्ममंथन और चिंतन का संयोग होता है. और इसमें शर्म की भी क्या बात है? महान लोगों ने जेल को ही अपना कर्मभूमि बनाया था. गांधी, मंडेला, अंग सां सू की, हर्षद मेहता, सलमान खान, जयप्रकाश नारायण कौन नहीं गया जेल? बंधू, महान होना है तो जेल जाओ.

खुद सोचो. अगर नेहरु जेल नहीं जाते तो क्या भारत को समझ पाते? इतनी साड़ी किताबें उन्होंने जेल में रहकर ही तो लिखी? वरुण गाँधी को भी ज्ञान का प्रकाश जेल में मिला. मेरी मानिए आप एक बार जेल हो ही आईये.

Wednesday, August 26, 2009

ट्रायल

मुझे भगवन के दरबार में प्रस्तुत किया गया. पृष्ठभूमि में सुन्दर सुन्दर अधनंगी परियां पंखा झल रहीं थीं. कुछ बेसुरा सा संगीत और नृत्य का प्रोग्राम चल रहा था. सबकी नज़रें मुझे ही घूरे जा रहीं थीं. भगवन ने मुझसे पूछा:

"क्यूँ बे! कैसा लग रहा है?"
"प्रभु! आपको छोड़ यहाँ कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा".
"अच्छा? और मुझमें ऐसा क्या अच्छा लगा?"
"आप दया निधान करुना के सागर, विघ्नहर्ता और सबकी कुंडली तो आप ही बनाते हो".
"मूर्ख. वह ब्रम्हा का डिपार्टमेन्ट है".
"सॉरी. मगर सर्वशक्तिमान तो आप ही हो. ब्रम्हा भी तो आप के ही आधीन हैं." सुनकर भगवन अति प्रसन्न हुए और मंद मंद मुस्कुराते हुए कहा.
"इतनी तारीफ़ तो तुने धरती पर कभी नहीं की? ज़रा रिकॉर्ड देखना रे इसका."
"प्रभो! वहाँ इतना टाइम ही कहाँ मिलता था? नौकरी और छोकरी से कभी फुर्सत ही नहीं मिली. दिन रात कोल्हू के बैल की तरह ...."
"तेरे खाते में तो पुन्य का नामोनिशान ही नहीं. कितना ओवर ड्राफ्ट है तेरा?" उन्होंने मेरी बात काटते हुए आर्श्चय व्यक्त किया.
"हे परम पिता परमेश्वर!"
"पिता किसे बोला रे तू?"
"आप को ही"
"बड़ा सयाना है रे तू. धरती पे किसी और को माई बाप बोलता था और यहाँ आते ही पार्टी बदल ली?"
"वो तो कागजी माई बाप थे. असली तो आप ही हैं नाथ!"
"ओके ओके" टालते हुए और मेरी चालाकी भाँपते हुए कहा.
"स्वामी एक प्रश्न है".
"ऐं? कोई प्रश्न व्रश्न नहीं. यहाँ इसका अधिकार सिर्फ मुझे है," कुछ सोचते हुए "अच्छा चल पूछ ही ले. एक ही पूछना".
"पिछले पांच सालों में प्रमोशन क्यूँ नहीं मिला?"
रिकॉर्ड देखकर उनका सेक्रेटरी बोला
"तुम्हारा पडोसी रोज़ घी के दिए जलाता था प्रभु के फोटो के सामने. और तुम्हारी प्रमोशन ना हो इसकी विनती करता था. पूरे पांच सालों में चार डब्बे शुद्ध घी के दिए जलाए और पैंतीस किलो लड्डू चढाये".
भगवन ने भृकुटी तानकर पूछा-
"आया समझ में?"
"लेकिन कृपालु, लड्डू तो उसी ने खाएं होंगें? आपको थोड़े दिए?"
इस पर चापलूस पसंद भगवन अस्मंज़स में पड़ गए.
"महाप्रभु, जब भी वह फेल होता था सारा कसूर आपको ही देता था. लेकिन कामयाबी का सेहरा खुद ही बांधता था. आपको उसने कभी भी क्रेडिट नहीं दी".
भगवन को मेरे पडोसी पर गुस्सा आने लगा.
"ऐसा क्या?"
"स्वामी, आप तो सिर्फ पिक्चर देखते हो वो भी बिना साऊंड के. धरती की आवाज़ थोड़े सुनाई देती है यहाँ".
इतने में यमराज का हेड क्लर्क भागता हुआ आया.
"महाराज, भारी त्रुटि हो गयी. क्षमा कीजिये. त्रुटिवश दीपक चोपडा की जगह इसको उठा लाये".
मैंने मौका ताड़कर भगवन के पैर जोर से पकड़ लिए. उन्होंने मुझे धरती पर वापस फेंकने का हुक्म जारी कर दिया.

नींद खुली तो मैं बिस्तर से गिरकर जमीन पर पड़ा हुआ मिला.