घड़ी ने छ बजाये नहीं कि मेरा ध्यान घर की तरफ अनायास चला जाता है. अगर कोई बहुत जरूरी काम न हो तो ऑफिस में फालतू रुकने का ज़रा भी मन नहीं करता. लेकिन इन बॉस लोगों के पास कुछ काम तो होता नहीं. अब वो बैठें हों तो हम घर जाने की बात सोच भी कैसे सकते हैं? बॉस, रुकना तो पड़ेगा ही. वो लोग तो बैठे बैठे ट्रैफिक कम होने का इंतज़ार करते हैं. . . खैर, दस तक बज जाते हैं निकलतेनिकलते और घर ऐसे पहुंचता हूँ जैसे कोल्हू के बैल छूटते ही भागते हैं.
अब ऐसे में कोई दोस्त मिलने की बात करे तो? कहे चर्चगेट आ जा तो कितनी खुन्नस होगी. सोचिये ज़रा? जब घर पहुँचता हूँ सब सो चुके होते हैं. फटाफट खाकर गिरते ही कब नींद आती है और कब सुबह हो जाती है, पता ही नहीं चलता. अगर फिर से जागना न हो तो अलार्म घड़ी कबका तोड़ कर रख देता. गिरते- पड़ते ऑफिस हमेशा लेट पहुंचता हूँ और बॉस की तिरछी नज़र से बचते बचाते मशीन ऑन करता हूँ. ऑफिस और ऑफिस पॉलिटिक्स की बातें फिर कभी करूंगा. . .
मेरी एक गर्ल फ्रेंड थी जो अक्सर कहीं मिलने की बात करती थी. अगर उसके रूठ जाने का ग़म नहीं होता तो मैं साफ़ मना कर देता. लेकिन उन्हें कौन समझाए. ऊपर से उसे शौपिंग का बहुत शौक था. शौपिंग कम विण्डो शौपिंगज्यादा करती थी. एक- एक चीज़ को खरीदने में घंटों लगा देती लेकिन चेहरे पर मैं शिकन नहीं आने देता था. उसे गुस्सा बहुत आता था. सन्डे मतलब दिन भर सोने की आजादी. लेकिन इश्क़ होने का बाद सोने का मौका ही नहीं मिलता. ऐसा नहीं नींद नहीं आती थी. उसके रूठने का डर होता था वरना अपनी सुहानी नींद को कौन कुर्बान करे?
अक्सर बोलती घुमने चलो. आज तक समझ में नहीं आया मुंबई में घुमने लायक कौन सी जगह है? शोर और धुंए के बीच घूमना कैसा? जहां भी जाओ, भीड़ और ट्रैफिक. मुझे शांति से दो पल बैठना अच्छा लगता है. लेकिन इन लड़कियों को कौन समझाए? फिर अचानक एक दिन उसका रूठना बंद हो गया. अब उसे शौपिंग या घुमाने से भी आजादी मिल गयी. दरअसल मैंने उससे शादी कर ली.
Hope
8 years ago

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