Thursday, July 9, 2009

परवरिश आजकल

अभी हाल ही में जहाँगीर आर्ट गैलरी गया था. और जब भी जाता हूँ सिर्फ दंग होकर लौटता हूँ. कितना हूनर है लोगों में. कितनी अगाध समर्पण की भावना से लोग काम करते हैं. कितने लोग वक़्त निकलकर जा पाते हैं वहाँ? मैंने देखा नाना प्रकार के लोग वहाँ थे- अनपढ़ भी थे और अँगरेज़ भी. बहुत कुछ तो मेरे पल्ले नहीं पड़ा मगर जो भी था प्रसंशनीय था. सच, सिर्फ पैसा कमा लेना ही सफलता नहीं होती. सिर्फ 'एक्साम' पास कर लेने से हम शिक्षित नहीं हो जाते.

मैं कभी- कभी बहुत निराश हो जाता हूँ जब देखता हूँ कि लोग कितने अज्ञ और अनभिग्य हैं और उन्हें कोई अफ़सोस भी नहीं. वो संतुष्ट हैं अपनी ९-८ नौकरी से. उन्हें कुछ जानने की न तो कोई इच्छा है न चाह. उन्हें क्या कि टगोर ने गीतांजलि में क्या लिखा, विवेकानंद क्या शिक्षा देकर गए, आइंस्टाइन ने भारत के बारे में क्या कहा है? कबीर क्या समझा गए. निखिल बनर्जी कौन हैं और उस्ताद अकबर अली खान कौन थे? NCPA में कौन सा शो चल रहा है? देश के अंदरूनी हिस्सों में क्या हो रहा है?

उनसे पूछो राखी सावंत का शो कब है? हिमेश रेशमिया का नया हिट गीत क्या है. सलमान, कैटरिना से किस बात पर नाराज़ हैं या सैफ अली खान की नई गर्ल- फ्रेंड कौन है, सब बता देंगें.

अब आप किसको दोष देंगें?

लोग थूकते क्यूँ हैं भाई?

लोग थूकते क्यूँ हैं भाई? यह सवाल अक्सर मेरे दिमाग में कौंध जाता है जब भी मैं किसी को थूकता हुआ पाता हूँ. और यह हर रोज़ होता है. जहाँ देखो, जब देखो लोग चपाक से थूक देते हैं. बिना आगे- पीछे देखे बिना. मुझे घिन कम गुस्सा ज्यादा आता है. थूक कर लोग टीबी ही नहीं फैलाते अपितु एक असभ्य समाज का परिचय देते हैं. ऐसे ऐसे स्टाइल, साइज़ और डिजाईन में थूकते हैं कि पूछो मत. जहाँ लिखा हो 'थूकना मना है' वहीँ थूकेगें. रेलवे पूल पर चढ़ते हुए मैं अक्सर बड़े- बड़े, रंग- बिरंगे थूक देखता हूँ तो जी में आता है थूकने वाले को पकड़कर एक जोर से चांटा दूं.

बचपन में पहले मैं भी थूकता था जब कोई भी बदबूदार चीज़ या मरा हुआ जानवर देख लेता या किसी को थूकते हुए देख लेता. और तब तक थूकता था जब तक कि मैं थक नहीं जाता. फिर एक दिन मैंने स्वयं से पूछा 'क्या इससे कुछ फायदा होता है?'. तबसे मेरा थूकना हमेशा के लिए बंद हो गया.

Wednesday, July 8, 2009

दूसरा २६/०८

अमेरिकी इंटेलिजेंस एजेंसियों की मानें तो पाकिस्तानी आतंकवादी संगठन लश्करे तय्यिबा फिर से मुंबई में कहर बरपाने वाला है, जैसा की हम पिछले वर्ष २६ नवम्बर को देख चुके हैं. अगर ऐसा फिर हो भी तो कोई अचम्भा नहीं. मानो हम इसके आदी हो चुके हों या तैयार बैठों हों. कल्पना करने की कोई आवश्यकता नहीं. वही होगा जैसा पिछली बार हुआ था. टीवी चैनलों को एक नया मसाला मिल जायेगा. पलानिअप्पन चिदंबरम को डांट पड़ेगी या ज्यादा से ज्यादा मंत्री पद से हाथ धोना पड़ेगा. नेता लोग टेंसुयें बहायेंगें, पडोसी को भीषण धमकियां दी जायेगीं , अमेरिका से गुहार लगाईं जायेगी, एक जांच कमिटी गठित की जायेगी, सीमा पार से बयानबाजी होगी, लोग मोमबत्तियां जलाने के लिए इकट्ठे होंगें और फिर सब भूल जायेंगें.

ऐसा ही हुआ है और ऐसा ही होता रहेगा. आपका क्या ख्याल है?

Mumbai

बस और ट्रेन के धक्कों से
सीधी हो जाती है कमर

सारा दिन धुल और धुंए से
पेट जाता है भर

और जो रहा सहा होता है
वो सब भूल जाता है पीकर

That’s Mumbai
The city I hate to love.

Saturday, July 4, 2009

एक 'ऑफिस गोअर' की दास्तान

घड़ी ने छ बजाये नहीं कि मेरा ध्यान घर की तरफ अनायास चला जाता है. अगर कोई बहुत जरूरी काम न हो तो ऑफिस में फालतू रुकने का ज़रा भी मन नहीं करता. लेकिन इन बॉस लोगों के पास कुछ काम तो होता नहीं. अब वो बैठें हों तो हम घर जाने की बात सोच भी कैसे सकते हैं? बॉस, रुकना तो पड़ेगा ही. वो लोग तो बैठे बैठे ट्रैफिक कम होने का इंतज़ार करते हैं. . . खैर, दस तक बज जाते हैं निकलतेनिकलते और घर ऐसे पहुंचता हूँ जैसे कोल्हू के बैल छूटते ही भागते हैं.

अब ऐसे में कोई दोस्त मिलने की बात करे तो? कहे चर्चगेट आ जा तो कितनी खुन्नस होगी. सोचिये ज़रा? जब घर पहुँचता हूँ सब सो चुके होते हैं. फटाफट खाकर गिरते ही कब नींद आती है और कब सुबह हो जाती है, पता ही नहीं चलता. अगर फिर से जागना न हो तो अलार्म घड़ी कबका तोड़ कर रख देता. गिरते- पड़ते ऑफिस हमेशा लेट पहुंचता हूँ और बॉस की तिरछी नज़र से बचते बचाते मशीन ऑन करता हूँ. ऑफिस और ऑफिस पॉलिटिक्स की बातें फिर कभी करूंगा. . .

मेरी एक गर्ल फ्रेंड थी जो अक्सर कहीं मिलने की बात करती थी. अगर उसके रूठ जाने का ग़म नहीं होता तो मैं साफ़ मना कर देता. लेकिन उन्हें कौन समझाए. ऊपर से उसे शौपिंग का बहुत शौक था. शौपिंग कम विण्डो शौपिंगज्यादा करती थी. एक- एक चीज़ को खरीदने में घंटों लगा देती लेकिन चेहरे पर मैं शिकन नहीं आने देता था. उसे गुस्सा बहुत आता था. सन्डे मतलब दिन भर सोने की आजादी. लेकिन इश्क़ होने का बाद सोने का मौका ही नहीं मिलता. ऐसा नहीं नींद नहीं आती थी. उसके रूठने का डर होता था वरना अपनी सुहानी नींद को कौन कुर्बान करे?

अक्सर बोलती घुमने चलो. आज तक समझ में नहीं आया मुंबई में घुमने लायक कौन सी जगह है? शोर और धुंए के बीच घूमना कैसा? जहां भी जाओ, भीड़ और ट्रैफिक. मुझे शांति से दो पल बैठना अच्छा लगता है. लेकिन इन लड़कियों को कौन समझाए? फिर अचानक एक दिन उसका रूठना बंद हो गया. अब उसे शौपिंग या घुमाने से भी आजादी मिल गयी. दरअसल मैंने उससे शादी कर ली.