Tuesday, June 30, 2009

नेट्वर्किंग

कहते हैं बिना नेट्वर्किंग के कुछ भी नहीं होता. चाहे जिस फिल्ड में आप हों बिना जान पहचान के कुछ नहीं होता. यही सोचकर मैंने भी जान पहचान करनी शुरू की. जब कभी किसी से मिलता हूँ उसका बिज़नस कार्ड जरूर लेता हूँ. इस उम्मीद में कि कुछ काम आ जाएगा. लेकिन जब काम पड़ती हैं तो लोग अनजान बन जाते हैं. मेल का जवाब नहीं देते और फ़ोन उठाना बंद कर देते हैं या कहते हैं बाद में कॉल करूंगा और नहीं करते हैं. एक बार ट्रेन में एक सज्जन मिले. बोले: मैं बहुत बड़ा बिज़नस मैन हूँ और कोलकाता चीफ मिनिस्टर से मिलने जा रहा हूँ. सुभाष घई, अनु मलिक उनके दोस्त हैं और रोज उनके साथ गोल्फ खेलतें हैं. हाल ही में वो सब लन्दन में छुट्टियाँ मना कर लौटे हैं. उन्होंने अपने घर का दो पता दिया. दोनों घर जुहू में ही थे. घर से वापस लौटते ही मैं उनके घर मिलने गया. पता तो सही था लेकिन घर उनका नहीं था. फिर फ़ोन पर बहुत कोशिश की लेकिन वे हमेशा व्यस्त होते थे या फ़ोन ही नहीं उठाते थे. मैं समझ तो गया थाकि माज़रा क्या है लेकिन फिर भी एक उम्मीद थी शायद बात बन जाए.

कई सारे ऐसे दोस्त भी बन जाते हैं जिनसे फ़ोन पर लम्बी बातें हो जाती हैं लेकिन चेहरा बिल्कुल याद नहीं रहता. अगर हम कभी रास्ते में मिल भी जायें तो सामने से निकल जायेंगें लेकिन पहचान नहीं पायेंगें. जिनको पहचानते हैं उनसे भी कभी मिलना कहाँ होता है? आजकल किसके पास वक़्त है? बात हो जाए यही बहुत है. मेरे कुछ रिश्तेदार यहीं मुंबई में रहते हैं और पिछले चार सालों में शायद ही कभी मेरी सुध ली हो.

1 comment:

  1. कई साल पहले एक पुस्तक पढ़ी थी कि Seven habits of most effective people. यह कहती है कि नेटवर्किंग का बेहतर तरीका यह है कि आप लोगों से तब मिले जब आप को काम न हो अन्यथा लोग सोचते हैं कि केवल काम के लिये ही आता है।

    लगता है कि आप हिन्दी फीड एग्रगेटर के साथ पंजीकृत नहीं हैं यदि यह सच है तो उनके साथ अपने चिट्ठे को अवश्य पंजीकृत करा लें। बहुत से लोग आपके लेखों का आनन्द ले पायेंगे। हिन्दी फीड एग्रगेटर की सूची यहां है।

    कृपया वर्ड वेरीफिकेशन हटा लें। यह न केवल मेरी उम्र के लोगों को तंग करता है पर लोगों को टिप्पणी करने से भी हतोत्साहित करता है। आप चाहें तो इसकी जगह कमेंट मॉडरेशन का विकल्प ले लें।

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