Monday, June 29, 2009

मुंबई डायरी

हर शहर की एक धुन यानी रिदम होती है. और इस शहर में रहने वाले हर शख्स को उस धुन पर चलना होता है. अगर मुंबई के रिदम की तुलना लहरों से की जाए तो यह समुंदर की लहरों की तरह हमेशा तेज़ गति से बहती रहती है जहाँ ठहराव के लिए कोई जगह नहीं. यहाँ कोई रुकता नहीं हैं सिर्फ चलता है लगातार साँसों की तरह, धडकनों की तरह. बारिश हो, बाढ़ आ जाये, और शहर डूब जाये या बम कहर बरपा दें. यह शहर अपनी ही धुन में जीता है बिना किसी अर्ध या पूर्ण विराम के. यहाँ सब मिलता है. बड़ा पाव, गन्ने का रस, कच्चा चना, आम रस, छास, डोसा, इडली, पंजाबी, चाईनीज़, इटालियन, कांटिनेंटल हर तरह का स्वाद.

मुंबई की बात हो और मुंबई लोकल का जिक्र न हो, मुमकिन नहीं. अगर आप मुंबई आयें और लोकल ट्रेन में सफ़र न करें तो आपकी यात्रा अधूरी ही रहेगी. आप सोचेंगें की आखिर ऐसी क्या बात है इसमें. तो जनाब यहाँ आपको पूरा भारत दर्शन हो जायेगा. आप ज़िन्दगी को करीब से देख पायेंगें. हर तबके के लोग, हर राज्य के लोग, हर नस्ल और भाषा से रूबरू हो सकेंगें. ऐसा मुंबई में ही हो सकता है जब आप के दाहिने कोई गुजराती में बात करता मिलेगा तो बायें तमिल में. आपके पीछे भोजपुरी सुनने को मिलेगी तो आगे इंग्लिश मेंगालियाँ.

मैं इस प्लेटफोर्म से मुंबई और उसके लोगों के बारें में बात करूंगा.

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