मुंबई की लोकल ट्रेनों में दो तरह के लोग चलते हैं. एक वो जो चुप चाप धक्का मुक्की बर्दाश्त कर लेते हैं और शांति पूर्वक यात्रा पूरी करते हैं. एक वो जो बस लड़ने को तैयार बैठे रहते हैं. आपने छुआ नहीं की बस गाली गलौज शुरू. फर्स्ट क्लास डब्बों में भी यह सब होता है लेकिन थोडा सभ्य तरीके से. वहाँ भी जब हालात काबू से बाहर हो जातें हैं तो गालियाँ 'हिंदी' में ही दी जाती हैं. जहां तक लेडीज डिब्बों की बात है तो उनकी बात न की जाए तो ही अच्छा है. आप इस कम्युनिटी को तो जानते ही हैं.
ऑफिस जाने के समय और लौटने के समय जो नज़ारा होता है अगर आप पहली बार देखें तो शायद बेहोश हो जाएँ. चूँकि सारे बिज़नस के कार्यालय साउथ मुंबई और टाऊन यानी चर्च गेट से अँधेरी के बीच ही हैं पूरी की पूरी भीड़ इधर ही आती है. लोग घंटों का सफ़र तैय करके विरार, पनवेल यहाँ तक कि कल्याण से इधर आते हैं. कुछ लोग तो रोज सूरत से मुंबई आते हैं. ट्रेनें ठसाठस भरी रहती हैं जैसे बोरे में भूसा भरा जाय. फिर भी लोग घुस ही जाते हैं. लोग अपने तन का पूरा पसीना आपके शफ्फाफ बदन से ऐसे पोंछ लेते हैं जैसे. . . अब क्या बताऊँ? कभी कभी गर्दन सीधी करने के लिए जगह मिल जाए तो अपने आप को खुश किस्मत समझिये.
Hope
8 years ago
