Tuesday, June 30, 2009

लोकल ट्रेन

मुंबई की लोकल ट्रेनों में दो तरह के लोग चलते हैं. एक वो जो चुप चाप धक्का मुक्की बर्दाश्त कर लेते हैं और शांति पूर्वक यात्रा पूरी करते हैं. एक वो जो बस लड़ने को तैयार बैठे रहते हैं. आपने छुआ नहीं की बस गाली गलौज शुरू. फर्स्ट क्लास डब्बों में भी यह सब होता है लेकिन थोडा सभ्य तरीके से. वहाँ भी जब हालात काबू से बाहर हो जातें हैं तो गालियाँ 'हिंदी' में ही दी जाती हैं. जहां तक लेडीज डिब्बों की बात है तो उनकी बात न की जाए तो ही अच्छा है. आप इस कम्युनिटी को तो जानते ही हैं.

ऑफिस जाने के समय और लौटने के समय जो नज़ारा होता है अगर आप पहली बार देखें तो शायद बेहोश हो जाएँ. चूँकि सारे बिज़नस के कार्यालय साउथ मुंबई और टाऊन यानी चर्च गेट से अँधेरी के बीच ही हैं पूरी की पूरी भीड़ इधर ही आती है. लोग घंटों का सफ़र तैय करके विरार, पनवेल यहाँ तक कि कल्याण से इधर आते हैं. कुछ लोग तो रोज सूरत से मुंबई आते हैं. ट्रेनें ठसाठस भरी रहती हैं जैसे बोरे में भूसा भरा जाय. फिर भी लोग घुस ही जाते हैं. लोग अपने तन का पूरा पसीना आपके शफ्फाफ बदन से ऐसे पोंछ लेते हैं जैसे. . . अब क्या बताऊँ? कभी कभी गर्दन सीधी करने के लिए जगह मिल जाए तो अपने आप को खुश किस्मत समझिये.

आमची मुंबई

मुंबई में कोई भी इंसान भूखा नहीं मर सकता. यहाँ सबके लिए अवसर है बस यह आप पर निर्भर है कि आप उसे पहचान पाते हैं या नहीं. हर जगह छोटे छोटे स्टाल लगाये लोग मिल जायेंगें- भेल पूरी, ताजे फूल, फिल्मों की सीडी, डीवीडी, करी पत्ते, केले, नीम्बू पानी इत्यादि. ऐसी ऐसी चीज़ें जिनकी आप कल्पना भर कर सकते हैं. ऑफिस जाते लोगों के लिए सुबह सुबह नाश्ता स्टेशन के पास उपलब्ध मिलेगा. लंच के वक़्त फलों का सलाद आपके ऑफिस के गेट के ठीक बाहर. कदम कदम पर रेस्तरां, जहां सस्ते भोज़न और खाने पीने की चीज़ें आपके मुंह को आराम करने का मौका नहीं देंगीं. ये सब चीज़ें तो हर बड़े शहर में मिल जाती हैं लेकिन मुंबई की खास बात है सिर्फ पांच रुपये में बड़ा पाव या दस रुपये में एक प्लेट इडली या मेदू बड़ा. यानी चट पट भोज़न कीजिये और काम पर चलिए.

अब ऐसे में आप साफ़ सफाई की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? बेशक़ बाकी विदेशी शहरों जैसे न्यू यार्क, लन्दन या शंघाई के मुकाबले मुंबई निहायती गन्दा है. बिडम्बना ही है कि लगभग हर बहुमंजिली इमारत को घेरे हुए 'चालें' दिखेगीं. पर मुंबई में सिर्फ झुग्गियां ही नहीं हैं, यहाँ गगनचुम्बी इमारतें भी हैं. साउथ मुंबई जहाँ कोलाबा और नरीमन पॉइंट जैसे बिज़नस हब हैं, जहाँ भारत के सबसे सम्पन्न व्यावसायिक परिवार जैसे अम्बानी और टाटा रहते हैं तथा कंपनियों के हेड ओफिसेस हैं. एक अलग 'एहसास' मिलता है जो ब्रिटिश साम्राज्वाद की निशानी हैं.

नेट्वर्किंग

कहते हैं बिना नेट्वर्किंग के कुछ भी नहीं होता. चाहे जिस फिल्ड में आप हों बिना जान पहचान के कुछ नहीं होता. यही सोचकर मैंने भी जान पहचान करनी शुरू की. जब कभी किसी से मिलता हूँ उसका बिज़नस कार्ड जरूर लेता हूँ. इस उम्मीद में कि कुछ काम आ जाएगा. लेकिन जब काम पड़ती हैं तो लोग अनजान बन जाते हैं. मेल का जवाब नहीं देते और फ़ोन उठाना बंद कर देते हैं या कहते हैं बाद में कॉल करूंगा और नहीं करते हैं. एक बार ट्रेन में एक सज्जन मिले. बोले: मैं बहुत बड़ा बिज़नस मैन हूँ और कोलकाता चीफ मिनिस्टर से मिलने जा रहा हूँ. सुभाष घई, अनु मलिक उनके दोस्त हैं और रोज उनके साथ गोल्फ खेलतें हैं. हाल ही में वो सब लन्दन में छुट्टियाँ मना कर लौटे हैं. उन्होंने अपने घर का दो पता दिया. दोनों घर जुहू में ही थे. घर से वापस लौटते ही मैं उनके घर मिलने गया. पता तो सही था लेकिन घर उनका नहीं था. फिर फ़ोन पर बहुत कोशिश की लेकिन वे हमेशा व्यस्त होते थे या फ़ोन ही नहीं उठाते थे. मैं समझ तो गया थाकि माज़रा क्या है लेकिन फिर भी एक उम्मीद थी शायद बात बन जाए.

कई सारे ऐसे दोस्त भी बन जाते हैं जिनसे फ़ोन पर लम्बी बातें हो जाती हैं लेकिन चेहरा बिल्कुल याद नहीं रहता. अगर हम कभी रास्ते में मिल भी जायें तो सामने से निकल जायेंगें लेकिन पहचान नहीं पायेंगें. जिनको पहचानते हैं उनसे भी कभी मिलना कहाँ होता है? आजकल किसके पास वक़्त है? बात हो जाए यही बहुत है. मेरे कुछ रिश्तेदार यहीं मुंबई में रहते हैं और पिछले चार सालों में शायद ही कभी मेरी सुध ली हो.

Monday, June 29, 2009

मुंबई डायरी

हर शहर की एक धुन यानी रिदम होती है. और इस शहर में रहने वाले हर शख्स को उस धुन पर चलना होता है. अगर मुंबई के रिदम की तुलना लहरों से की जाए तो यह समुंदर की लहरों की तरह हमेशा तेज़ गति से बहती रहती है जहाँ ठहराव के लिए कोई जगह नहीं. यहाँ कोई रुकता नहीं हैं सिर्फ चलता है लगातार साँसों की तरह, धडकनों की तरह. बारिश हो, बाढ़ आ जाये, और शहर डूब जाये या बम कहर बरपा दें. यह शहर अपनी ही धुन में जीता है बिना किसी अर्ध या पूर्ण विराम के. यहाँ सब मिलता है. बड़ा पाव, गन्ने का रस, कच्चा चना, आम रस, छास, डोसा, इडली, पंजाबी, चाईनीज़, इटालियन, कांटिनेंटल हर तरह का स्वाद.

मुंबई की बात हो और मुंबई लोकल का जिक्र न हो, मुमकिन नहीं. अगर आप मुंबई आयें और लोकल ट्रेन में सफ़र न करें तो आपकी यात्रा अधूरी ही रहेगी. आप सोचेंगें की आखिर ऐसी क्या बात है इसमें. तो जनाब यहाँ आपको पूरा भारत दर्शन हो जायेगा. आप ज़िन्दगी को करीब से देख पायेंगें. हर तबके के लोग, हर राज्य के लोग, हर नस्ल और भाषा से रूबरू हो सकेंगें. ऐसा मुंबई में ही हो सकता है जब आप के दाहिने कोई गुजराती में बात करता मिलेगा तो बायें तमिल में. आपके पीछे भोजपुरी सुनने को मिलेगी तो आगे इंग्लिश मेंगालियाँ.

मैं इस प्लेटफोर्म से मुंबई और उसके लोगों के बारें में बात करूंगा.