मुझे भगवन के दरबार में प्रस्तुत किया गया. पृष्ठभूमि में सुन्दर सुन्दर अधनंगी परियां पंखा झल रहीं थीं. कुछ बेसुरा सा संगीत और नृत्य का प्रोग्राम चल रहा था. सबकी नज़रें मुझे ही घूरे जा रहीं थीं. भगवन ने मुझसे पूछा:
"क्यूँ बे! कैसा लग रहा है?"
"प्रभु! आपको छोड़ यहाँ कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा".
"अच्छा? और मुझमें ऐसा क्या अच्छा लगा?"
"आप दया निधान करुना के सागर, विघ्नहर्ता और सबकी कुंडली तो आप ही बनाते हो".
"मूर्ख. वह ब्रम्हा का डिपार्टमेन्ट है".
"सॉरी. मगर सर्वशक्तिमान तो आप ही हो. ब्रम्हा भी तो आप के ही आधीन हैं." सुनकर भगवन अति प्रसन्न हुए और मंद मंद मुस्कुराते हुए कहा.
"इतनी तारीफ़ तो तुने धरती पर कभी नहीं की? ज़रा रिकॉर्ड देखना रे इसका."
"प्रभो! वहाँ इतना टाइम ही कहाँ मिलता था? नौकरी और छोकरी से कभी फुर्सत ही नहीं मिली. दिन रात कोल्हू के बैल की तरह ...."
"तेरे खाते में तो पुन्य का नामोनिशान ही नहीं. कितना ओवर ड्राफ्ट है तेरा?" उन्होंने मेरी बात काटते हुए आर्श्चय व्यक्त किया.
"हे परम पिता परमेश्वर!"
"पिता किसे बोला रे तू?"
"आप को ही"
"बड़ा सयाना है रे तू. धरती पे किसी और को माई बाप बोलता था और यहाँ आते ही पार्टी बदल ली?"
"वो तो कागजी माई बाप थे. असली तो आप ही हैं नाथ!"
"ओके ओके" टालते हुए और मेरी चालाकी भाँपते हुए कहा.
"स्वामी एक प्रश्न है".
"ऐं? कोई प्रश्न व्रश्न नहीं. यहाँ इसका अधिकार सिर्फ मुझे है," कुछ सोचते हुए "अच्छा चल पूछ ही ले. एक ही पूछना".
"पिछले पांच सालों में प्रमोशन क्यूँ नहीं मिला?"
रिकॉर्ड देखकर उनका सेक्रेटरी बोला
"तुम्हारा पडोसी रोज़ घी के दिए जलाता था प्रभु के फोटो के सामने. और तुम्हारी प्रमोशन ना हो इसकी विनती करता था. पूरे पांच सालों में चार डब्बे शुद्ध घी के दिए जलाए और पैंतीस किलो लड्डू चढाये".
भगवन ने भृकुटी तानकर पूछा-
"आया समझ में?"
"लेकिन कृपालु, लड्डू तो उसी ने खाएं होंगें? आपको थोड़े दिए?"
इस पर चापलूस पसंद भगवन अस्मंज़स में पड़ गए.
"महाप्रभु, जब भी वह फेल होता था सारा कसूर आपको ही देता था. लेकिन कामयाबी का सेहरा खुद ही बांधता था. आपको उसने कभी भी क्रेडिट नहीं दी".
भगवन को मेरे पडोसी पर गुस्सा आने लगा.
"ऐसा क्या?"
"स्वामी, आप तो सिर्फ पिक्चर देखते हो वो भी बिना साऊंड के. धरती की आवाज़ थोड़े सुनाई देती है यहाँ".
इतने में यमराज का हेड क्लर्क भागता हुआ आया.
"महाराज, भारी त्रुटि हो गयी. क्षमा कीजिये. त्रुटिवश दीपक चोपडा की जगह इसको उठा लाये".
मैंने मौका ताड़कर भगवन के पैर जोर से पकड़ लिए. उन्होंने मुझे धरती पर वापस फेंकने का हुक्म जारी कर दिया.
नींद खुली तो मैं बिस्तर से गिरकर जमीन पर पड़ा हुआ मिला.