Friday, December 11, 2009

लल्लन भाई

रास्ते में भीड़ देखा तो रिक्शेवाले ने कहा ज़रा देखते हैं माजरा क्या है. पता चला रानी मुखर्जी अपने किसी फिल्म के प्रचार के लिए तमाशे कर रही है. फिर मुझे लल्लन भाई की याद आ गयी. रानी उनकी पसंदीदा हीरोईन है. मैंने सोचा परदे पर इतनी हसीं दिखने वाली रानी वास्तव में इतनी कुरूप होगी लल्लन भाई ने शायद कल्पना भी ना की होगी. खैर. लल्लन भाई को हीरोईने तो पसंद हैं मगर सबसे स्मार्ट हीरो वो खुद को ही समझते हैं. एक दिन सलमान खान साहब आस पास पधारे तो मैंने छेड़ा "देखने नहीं गए?" बस बरस पड़े. "क्यूँ जाऊं?" मैंने कहा बहुत बड़े अभिनेता हैं. तो बड़ा टेड़ा जबाब मिला. "होंगें. होंगे बड़े अभिनेता अपने घर में, मुझे क्या? और बड़े किस ओर से भला? क्या वो चबा चबा कर नहीं खाते? या खड़े खड़े ही टट्टी करते हैं?"

भाई लल्लन भाई का कोई जबाब नहीं. दूध में मिश्री घोलकर पिलाते हैं. जबाब देने में उनका कोई सानी नहीं. मैंने एक दिन पूछा कि कैसे हो तो जबाब मिला " पहले घर में मच्छर थे, अब बीवी है." (दोनों खून चूस लेते हैं).

Thursday, December 10, 2009

विक्षिप्त लोग

बात उन दिनों की है जब हमारे अनुज (छोटे भाई) हास्टल में रहा करते थे. चूँकि वे फर्स्ट इयर में थे हर चीज़ में उनका नंबर बाद में आता था. मसलन अखबार पढने का पहला अधिकार सुपर सीनियर्स, फिर सीनियर्स का होता था. इनका नंबर सबसे बाद में आता था. जिस दिन कोई मसालेदार खबर होती तो अखबार नसीब ही नहीं होता था और जिस किसी दिन कोई गरमा गरम खबर नहीं होती, मिनटों में अखबार इनके बिस्तर पर आ जाती. अब आप सोचेंगे कि यह कैसी खबरें हैं तो एक नमूना पेश है:

* नाबालिग छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार
* मामा के साथ युवती फरार
* पिता ने किया पुत्री के साथ दुष्कर्म
* प्रेमिका ने प्रेमी से मिलकर की पति की हत्या


ये अखबार वाले भी जानते हैं कि लोग चाहते क्या हैं. इसलिए ऐसी ख़बरों को पूरे विस्तार से छापते हैं. जितना ही 'डीटेल" होगा खबर उतनी ही हिट होगी. बात छोटी नहीं है. यह एक बहुत बड़े वर्ग की दास्ताँ है जो हमारे इसी सभ्य समाज में कहीं छुपे हुए हैं. इस विक्षिप्त मानसिकता का एक और उदहारण है- फिल्मों में बलात्कार के सीन आने पर लोगों द्वारा सीटी बजाना. वैसे वही लोग हीरो के इंट्री और विलेन की धुनाई पर भी सीटी बजाते हैं. आपने कभी सोचा है कि फिल्मों में बलात्कार के दृश्य क्यूँ अनिवार्य थे कभी? अब यह बी, सी ग्रेड की फिल्मों तक ही सिमट गया है. तो क्या हम पहले से ज्यादा सभ्य हो गए हैं? लेकिन बलात्कार तो अब भी होते हैं. क्या यह उस मानसिकता की उपज है जहां हम दूसरों के दुःख में सुख तलाशते हैं?

Friday, October 16, 2009

शुभ दीपावली

प्रिय मित्र गण,
प्रकाश के इस अनूठे और अलौकिक पर्व, दीपावली पर समस्त मित्रों को हार्दिक शुभकामनाएं. ईश्वर आप सब की मनोकामनाएं पूर्ण करें.

सस्नेह आपका,
दीपक

Thursday, October 8, 2009

अगर मैं लड़की होता

अगर मैं लड़की होता तो क्या होता? अव्वल तो मुझे नौकरी जैसी चीज़ नहीं करनी पड़ती. करता भी तो शौकिया. घर बैठे ऐश करता. हज़ार पीछे घूमते, कितने आह भरते. आनलाईन होता तो सैकडो मक्खी की तरह चैट करने के लिए चिपक जाते. बॉस कभी अकड़ कर बात नहीं करता, पगार जल्दी जल्दी बढती; प्रमोशन फ़टाफ़ट मिलता. पालिटिक्स में भी औरतों के लिए अच्छा खासा स्कोप होता है.

मिस वर्ल्ड बनकर फिल्मों में उतरता. रातों रात किस्मत बुलंद हो जाती. जिनको छू देता, तर जाते. लटके झटके दिखा कर टी वी शो तो कर ही लेता. लोग पार्टियों में बुलाते. हीरोईन नहीं तो बिकनी पहन कर आईटम नंबर तो कर ही लेता. कुछ नहीं तो चीयरलीडर्स में अच्छी आमदनी हो जाती. थोडी उम्र ढलने लगती तो किसी बिजनेसमैन को पटा लेता ताकि बुढापा आराम से कट सके. 'एन आर आई' वाला आप्शन तो हमेशा खुला है. मैं लड़की होता तो कोई मामूली लड़की थोड़े होता. आप जानते हैं मेरा मतलब. कितने उद्योगपति और नेतागण ऐसी जानलेवा अदाओं के शिकार हुए हैं.

दो लाख लोग रोज़ मेरा प्रोफाईल निहारते. मीठी मीठी बातें लिखते. अपना दिल स्कैन करके भेजते रहते. हाल चाल लेने और गिफ्ट देने वालों का तांता लगा रहता. आसानी से कारों में लिफ्ट मिल जाती. अभी दो चार लोग मेरे ब्लॉग पर कमेन्ट लिखते हैं, तब हज़ार लोग लिखते. शादी हो जाती तो पति चू **** की तरह काम करता और मैं किटी पार्टियां आयोजित करता. नए नए शौक़ होते मसलन 'इंटीरियर डिजायनिंग' पेंटिंग्स खरीदना वगैरह. अगर किस्मत वहाँ भी साथ नहीं देती तो किसी फ़िल्मी हीरो के घर में 'कामवाली' की नौकरी का बेहतरीन विकल्प तो है ही.

मेरे बड़े भाई साहब आज भी ताना मारते हैं कि मैं एक लड़की नहीं पटा सका. तब ऐसे जहर बुझे ताने तो नहीं सहने पड़ते!!

Wednesday, October 7, 2009

दीवाली की शुभकामनायें

दीवाली आ रही है. खूब बम फूटेंगे शोर शराबे मचाने के बाद लोग और भी शोर मचाएंगे जब तक गले में कैंसर ना हो जाए. घर का सारा कचरा सड़क पर रखा जाएगा ताकि लक्ष्मी आकर घर नोटों से भर दें. ताकि जुआ खेला जा सके. दारु पिया जा सके. भाई, एक बात बताओ. अगर सारा माल लक्ष्मी ही रखती हैं तो मुसलमानों को पैसा कौन देता है? शायद दूर से वह देख नहीं पाती होंगी कि सामने वाले का मज़हब क्या है. वैसे मुसलमान भी 'बड़ी दीवाली' मनाते हैं, पूरे साल. हम एक बार मनाते हैं वे आये दिन कहीं ना कहीं मनाते रहते हैं. हम छोटे- छोटे पटाखे फोड़ते हैं उनसे कहाँ मुकाबला?

हिन्दू मानते हैं कि शेषनाग ने पृथ्वी को अपने फन पर उठा रक्खा है. बड़ी नाइंसाफी है. मुसलमानों और इसाईओं का बोझ अपने सर पर क्यूँ ढोते फिर रहे हैं? झटक क्यूँ नहीं देते इन सबों को? हिन्दुओं के पूजा करने का क्या फायदा? खैर, हम लक्ष्मी की बात कर रहे थे जिनके पास खूब माल है. लेकिन घर नहीं. बेचारी क्षीर सागर में खुले आसमान के नीचे रहती हैं. कुछ- कुछ बिहार के बाढ़ग्रस्त इलाकों में रहने वालों के जैसे. और अपने भोले नाथ भी तो कैलाश पर्वत की चोटियों पर अकेले अकेले भंग खाए मदहोश पड़े रहते हैं.

अरे! कोई उन्हें जगाओ भाई.

Thursday, September 24, 2009

आदमी और कुत्ता

मेरी गली में चार पांच कुत्ते रहते हैं जिन्हें मैं रोज़ बिस्किट खिलाता हूँ. और लोग भी खिलाते हैं लेकिन मैं जितना खिलाता हूँ वो हमेशा खाने को तैयार बैठे रहते हैं. गोया उनका पेट कभी भरता ही ना हो. सब आपस में इस बात की प्रतियोगिता करते हैं कि कौन सबसे ज्यादा दुम हिला सकता है. एक कुत्ते को मैंने देखा है. वो बाकी कुत्तों पर धौंस जमाने की कोशिश करता है और मुझे यह जताने की कोशिश करता है कि वो सबसे ज्यादा वफादार है. ताकि वो सबसे ज्यादा दुम हिलाने का श्रेय पा सके और सबसे ज्यादा बिस्किट खा सके. कुछ दिन मैंने बिस्किट खिलाना बंद करके भी देखा. उन्होंने मेरी ओर देखना भी बंद कर दिया. शायद उन्हें लगा हो कि मैं अब किसी काम का नहीं रहा.

अजीब बात है कि कुत्तों में भी इंसानी आदतें पनप रही है.

Tuesday, September 22, 2009

डूड

आजकल 'डूड' कहने और कहलाने का चलन है. लड़कियां 'बेब' कहलाना पसंद करती हैं. एक समय था जब लड़कियों के नाम के आगे 'देवी' लगाकर सम्मान दिया जाता था. अब किसी को जरा देवी कह कर तो देखो. शहर में रहकर थोडा शहरीकरण हो गया है. वरना अभी भी मन से देहाती ही हूँ. गाँव वाले 'बम्बईया' कहते हैं और यहाँ के लोग 'देहाती' समझते हैं. ना गोंद लगाकर बालों को कौए का घोंसला बनाकर घूमता हूँ. ना टट्टू बनवाया कभी. कैफे काफी डे में बैठकर बेकार में ना गुफ्तगू करता हूँ. ना तो किसी दारू का नाम पता है. ना किसी क्लब का कभी मुंह देखा. ना इत्रों का शौक़ है. ना सरकता जींस पहनता हूँ ताकि किस ब्रांड का अंडर वीयर पहना है लोग मालूम कर लें.

यह बात समझ में क्यूँ नहीं आती की आधुनिकता विचारों से आती है. चमाचम जूते और अच्छे कपडे पहन लेने से मन का विकास नहीं होता. लेकिन अब इन्हें कौन समझाए? 'आई फोन' वाला साधारण फोन वाले को तुच्छ समझता है. 'मर्सीडीज़' वाला 'मारुती' वाले को पिछडा समझता है. अब अमरीकी संस्कार हमारे बच्चों में प्रतिस्फूटित हो रहे हैं तो आगे स्तिथि कितनी भयावह होगी इसकी परिकल्पना मैं नहीं करना चाहता. लेकिन इतना तय है की एक दिन आएगा जब अमरीकी हमें योग सीखाएँगे, गीता और रामायण का पाठ कराएँगे. और हम उनसे सीखेंगे की सुख पूर्वक कैसे जीया जाता है.

सादगी का जमाना ही नहीं रहा. अब यह सब गंवारपन लगता है.

Friday, September 18, 2009

प्रसादम् देहि

कल अजीब बात हुई. एक रेस्तरां में बैठा खाना खा रहा था और टीवी पर टाटा टी का विज्ञापन चल रहा था जिसमें 'चाय- पानी' यानी घूस के खिलाफ मुहीम चलाया जाता है- "ये (भ्रष्ट नेता और बाबू) खाते हैं क्यूंकि हम इन्हें खिलाते हैं. खिलाना बंद करो, पिलाना शुरू करो". मैं सोच ही रहा था की क्या इस विज्ञापन से कोई बदलाव आ पा आएगा? इत्तेफाक से तभी पुलिस की एक गाडी वहाँ रुकी. चुपके से रेस्तरां के मालिक ने सौ का एक नोट गाडी में बैठे एक पुलिस वाले को पकडा दिया. ऐसा आसपास के कुछ और दुकानदारों ने भी किया. बाद में उसने मुझे बताया की ऐसी कई गाडियां आती हैं. दिन की अलग और रात के लिए अलग गाडियां हैं. हर बार एक नया पुलिसवाला आता है और हर पुलिसवाले को 'प्रसाद' चाहिए होता है. यह तो बोनस है. ये लोग हर महीने 'बड़े साहब लोगों' को पांच हज़ार का प्रसाद पहले ही चढा आते हैं. लेकिन ये लोग ऐसा क्यूँ करते हैं? क्यूंकि महाडा के रिहायशी इलाकों में रेस्तरां खोलना गैरकानूनी है और इसकी पेनाल्टी बारह हज़ार है.

इस घटना से मुझे इलाहाबाद की दो घटनाएं याद हो आयीं. एक बार मैं अपने एक पुलिस आफिसर दोस्त के साथ कहीं से आ रहा था. रास्ते में अचानक एक ट्रक रूका और उसमें से एक पुलिसवाला गालियाँ बकता हुआ उतरा. मेरा दोस्त ठहाके लगाने लगा. मैंने कारण पूछा तो उसने कहा "भाई साहब को प्रसाद नहीं मिला. उसके कागजाद सही रहे होंगे सो उसने इनकार कर दिया. दरअसल हम पुलिसवाले खुद नहीं चाहते की लोग नियम से चलें".

दूसरी घटना थोडी मार्मिक है. मैं राजरूपपुर के तिराहे पर खडा था. वहाँ एक पुलिसवाला चंदा वसूल रहा था. रिक्शेवाले तेजी से भाग जा रहे थे. जो पकडे जाते थे उनको 'खुरचन' देना पड़ता था. जो कुछ चालाक थे दूर से एक रूपये का सिक्का फ़ेंक दे रहे थे. वह दृश्य आज भी मेरे जेहन में है और मैं जब भी पुलिसवालों को देखता हूँ उनके प्रति मेरी श्रद्धा और करुना और भी बढ़ जाती है.

लौंडीयाबाजी

अब तक तो आप समझ ही चुके होंगे की मेरे पास कोई काम धाम नहीं है. और ये भी की मेरे दिमाग में कितना कचरा भरा है. लेकिन खुदा कसम जो मैंने किसी के साथ कोई बदतमीजी की हो. कभी किसी लड़की को आँख नहीं मारी या सिटी नहीं बजाई (यह बात और है की ऐसी तबियत कई बार हुई).

तो आप किस्मत में यकीन नहीं करते हैं? फिर इसे आप और क्या कहेंगें पिछले बीस सालों में कभी भी कोई खूबसूरत लड़की मेरे बगल में आकर नहीं बैठी? खड़ी होकर सफ़र कर लेगी पर मेरे बगल में नहीं बैठेगी. भला हो उस नशेड़ी ड्राइवर का और सड़क बनाने वालों का. अगर ऐसे खूबसूरत गड्ढे नहीं होते तो मैं इस जन्म में नारी स्पर्श से वंचित ही रह जाता.

ट्रेन में चढ़ने से पहले सबसे पहले रिजर्वेशन लिस्ट पर निगाह दौडाता हूँ काश कोई खूबसूरत परी मेरे साथ सफ़र करे. कोई खूबसूरत हमसफ़र हो तो सफ़र का पता ही नहीं चलता. फिर चाहे ट्रेन एक के बदले चार दिन क्यूँ ना ले ले. ज़रा से भी शिकन नहीं आती. खूबसूरती को आत्मसात करके जो परमानन्द प्राप्त होता है वह किसी स्वर्गीक अनुभव से कतई कम नहीं होता. मेरा दुर्भाग्य देखिये की हमेशा खडूस बुड्ढे या पायरिया ग्रस्त आंटियां ही मेरे साथ सफ़र करती हैं. स्लीपर क्लास से एसी थ्री फिर एसी टू में भी सफ़र किया. यहाँ तक की हवाई जहाज में भी चढ़ लिया मगर ऐसा सुअवसर प्राप्त नहीं हुआ.

पाठक समझेगें की मैं बड़ा रसीक किसिम का इंसान हूँ या लौंडीयाबाजी की गन्दी गन्दी बातें करता हूँ. भई सिर्फ बातें ही तो करता हूँ. मैंने ना तो नाज़नीनों के कपडे चुराए ना किसी स्त्री का चीरहरण किया. यही काम कृष्ण ने किये तो आपने कहा प्रभु लीला कर रहे हैं. और आप खामखा मुझे तोहमत दे रहे हैं? यह तो सरासर नाइंसाफी है भाई.

Wednesday, September 16, 2009

गुलज़ार

अब तक मैंने सिर्फ एक ही शख्स का ऑटोग्राफ लिया है. जिसका नाम सम्पूर्णानन्द सिंह है और जिसे आप गुलज़ार के नाम से जानते हैं. बड़ा सनकी और जुनूनी नासिख (लेखक) है. एक तो शायर ऊपर से सरदार. कभी दिल निचोड़ने लगता है तो कभी जिगर की आग से बीडी जलाने लगता है. कुछ भी लिखता है. जिसका ना ओर ना छोर. कभी उसके पाँव सपनों पर पड़ जाते हैं कभी वह बड़े बड़े कोयले से फलक पर नाम लिखता है, कभी उसका मन होम होम करने लगता है, कभी सात रंग के सपने बुनता है, कभी 'लकडी की काठी का घोड़ा' बन जाता है, कभी कागज़ की कश्ती खेने बचपन में लौट जाता है. कभी इश्क में छैयां छैयां करता है, कभी भेंजे में गोली मारने की बात करता है. जो तिनको के नशेमन में रहता है और शीशे का घरौदा तैयार करता है. जो अकेला शहर में आबदाना ढूंढता है. जो 'बाबू मोशाय' बनकर रुलाता है जो 'अंगूर' में गुदगुदाता है.

'मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है' लिखकर जब ले गया तो पंचम ने डाटा "कल को तू अखबार लेकर आएगा और कहेगा कम्पोज़ कर?"

कहा ना? कुछ भी लिखता है. कुछ भी. सच, तुम जैसों के बाद तो हिंदी फिल्मों का संगीत गूंगा हो जायेगा.

Friday, September 11, 2009

ऐसा देश है मेरा

कृपया अब आप जो पढने जा रहे हैं उसे कोई कहानी या चुटकुला समझकर मत पढें. एक बार भारतवर्ष के एक कवि विदेश यात्रा पर गए. वहां 'शुद्ध दूध' की तलाश में दिन भर भटकने के बाद उन्होंने एक दूधवाले से मायूसी से कहा "कैसा देश है जहां 'शुद्ध दूध' तक नहीं मिलता". उसने हैरानी से पूछा "दूध तो मालूम है पर 'शुद्ध दूध' क्या होता है?". कवि महोदय ने उत्तर में कहा "अरे दूध जिसमें पानी ना मिलाया गया हो". फिर दूधवाले ने अचम्भे से पूछा "भला, दूध में पानी भी मिलाया जाता है?".

ऐसा है अपना देश. गया जमाना जब हम दूध में पानी मिलाया करते थे. हमने इतनी तरक्की कर ली है कि यूरिया और केमिकल्स से दूध बना सकें. यह दुखद है हमारी इस उपलब्धि, इस शोध और अनुसन्धान को दुनिया मान्यता नहीं देती. हमें इसका प्रचार प्रसार करना चाहिए. इस विधा को विकसित देशों में ले जाया जाना चाहिए कि देखो कैसे हम बिना दूध मलाई के घी बना सकते हैं. आने दिनों में जब अकाल और खाने पीने की किल्लत होगी तो भारत ही एकमात्र देश होगा जो अन्नपूर्णा की तरह समस्त विश्व को दूध और घी से सराबोर कर देगा.

मेरी मम्मी कहती हैं कि दूध एक सम्पूर्ण भोजन है. लेकिन वह दूध मिलता कहाँ है? कीमतें आसमान छू रही हैं. जो चीज़ें उपलब्ध भी हैं उनमें जहर है. जरा सोचिये की खाएं तो क्या पीयें तो क्या? पीने का पानी, दारू, सब्जियाँ, फल यहाँ तक की नोट भी नकली हैं. और हमारी सरकारें चैन की नींद सोती हैं. वैसे एक सरल उपाय है. हमें कंकड़ पत्थर चबाना शुरू कर देना चाहिए. देश में प्रचुर मात्र में वे उपलब्ध हैं. फिर कंकड़ पत्थर में कोई भला क्या मिला सकेगा? पीने के लिए सरकार भले पानी ना उपलब्ध करा सके पर मुझे पक्का यकीन की वह चरस, गंजा, अफीम, बीडी, सिगरेट इत्यादि की कमी कभी नहीं होने देगी.

जय हिंद, जय नेतागण, जय भारतवासी.

Thursday, September 10, 2009

शिकायत

खुदा से मुझे बहुत शिकायत है. किसी रोज अगर मुलाक़ात हो तो मैं जमकर शिकायत करुँ. आखिर उन्होंने मुझे यूँ लापरवाही से जल्दीबाजी में क्यूँ बनाया? कहीं से भी बचा खुचा मटेरिअल उठाया और एक 'दीफेकटेड पीस' तैयार कर दिया.
अगर आलसी और कामचोर ही बनाना था तो क्यूँ भेज दिया एक गरीब ब्राम्हण के घर? बनाना था कहीं का प्रिंस या अरब का शेख? किसी शायर की तड़पती आत्मा को मेरे भेंजे में ठूंस दिया और कहा जा बेटा नौकरी कर, वो भी शेयर मार्केट में जहां मेहता, पारेख, शाह, पटेल और मारवाडियों से घिरा मैं असुरक्षित महसूस करता हूँ. "माल लाओ", "सौदा", "टका" जैसे शब्द मानो कवि की कल्पना का बलात्कार कर बैठते हों. मुझे भी किसी गुजराती के घर पैदा करा दिया होता?

इन गुजरातियों और मारवाडियों को बस एक ही भाषा समझ में आती है- पैसा. इनको क्या की शेक्सपियर का लिख गए और बाबर कौन सी खेत की मूली था या चन्द्रगुप्त/ समुद्रगुप्त किस चिडिया का नाम था? समुद्रगुप्त तो उन्हें समुद्र में गड़ा कोई गुप्त खजाना ही लगेगा. अब ऐसे 'दिमाग से पैदल' लोगों से पाला पडवा ही दिया है तो कुछ पैसा कमाने का आईडिया भी देता?

यारों, यह खुदा भी बड़ी काईयाँ चीज़ है. अपनी मस्ती के लिए मेरी लाइफ का तो गेम ही बजा डाला.

Friday, September 4, 2009

मुंबई किसकी?

हैरानी की बात है कि चाचा- भतीजा दोनों अभी तक खामोश बैठे हैं. कोई हंगामा नहीं, कोई फसाद नहीं? अरे भाई, 'इलेक्शन' सर पर है, अभी नहीं तो कभी नहीं. पिछली बार तो बहुत हो हल्ला मचाये थे कि मुंबई हमारी है. इस बार क्या हो गया?

अब जिक्र आया है तो बताते चलें कि राजू, यह मुंबई ना तुम्हारी है, ना हमारी. अगर इतिहास पढ़े होते तो पता चलता कि मुंबई अंग्रेजों की है. 1661 में मुग़लों ने मुंबई को चार्ल्स द्वितीय को दहेज़ में दे दिया था जब उसने कैथरीन ऑफ़ ब्रेगंज़ा से शादी की. अब दूसरे के दहेज़ की चीज़ पर क्यूँ हाथ साफ़ करते हो?

अब मुंबई में रहना है तो बोलो- जय इंग्लैंड. जय विक्टोरिया.

Thursday, September 3, 2009

धीरुभाई धरती पर

श्रद्धेय धीरुभाई घूस देने और मसखरा लगाकर काम निकलवाने में बड़े उस्ताद माने जाते थे. जाहिर है स्वर्ग में जाकर आदतें बदल तो जायेंगीं नहीं? सो, एक दिन भगवान के सेक्रेटरी को पटा कर तीन दिन की छुट्टी पर धरती पधारे.

सीधे कोकिलाबेन के पास गए जहाँ उन्होंने उनको खूब लताडा: "शर्म नथी? ढोंगी? थारी औकात जो. डुप्लीकेट कहीं का. मारो वर बनवानी सपनो जो" (हिंदी में- शर्म नहीं आती? ढोंगी? अपनी औकात तो देख. डुप्लीकेट कहीं का. मेरा पति बनने का ख़्वाब देख रहा है).

थोड़े उदास मुकेश के पास गए. तो मुकेश ने भी खूब खरी खोटी सुनाई. "ओये बुड्ढे! तेरा भेंज़ा फिर गया है क्या? माना की मेरे बाप की शक्ल तेरे इस मनहूस शक्ल से मिलती है. तो? देख, यह अनिल का बच्चा पहले से ही मेरी जान के पीछे हाथ धोकर बैठा है. अब तू तो मेरा सर मत खा. गार्ड, भगा इसे यहाँ से".

अनिल ने जब अपने भाई की शिकायत सुनी तो थोडी हमदर्दी हुई "हूँ. सबूत क्या है की तू मेरा बाप है?" फिर अचानक भड़क पड़े. "और है भी तो क्या लेने आया है अब? साला, बिना वसीयत के ही मर गया. उसी का नतीजा भुगत रहा हूँ अभी तक. थोडा रूककर नहीं मर सकता था?"

धीरूभाई करुण स्वर में बोले: बेटा, मौत पूछकर थोड़े आती है".

फिर अनिल के दिमाग में खूंखार विचार आने लगे की कैसे इसकी पब्लिसिटी करके फायदा उठाया जा सकता है और भाई को बदनाम किया जा सकता है. लेकिन उनके कानूनी सलाहकारों ने राय दी की कानून के नज़रों में धीरुभाई मर चुके हैं. और इस पब्लिसिटी के बदले वे हंसी के पात्र बन सकते हैं. बेचारे धीरुभाई जो अखबारों में अपना बड़ा बड़ा फोटो देखकर अपने प्रिय बेटों के अगाध प्रेम से भावविव्हल हो जाते थे, पहले ही दिन स्वर्ग वापस लौट गए.

Thursday, August 27, 2009

मेरा नेता बनते बनते रह जाना

बेकारी में खाली बैठे बैठे पॉलिटिक्स ज्वाइन करने का ख्याल आया. सोचा कोशिश करने में हर्ज़ ही क्या है? सबसे पहले सोनिआजी के पास गया. क्यूँ ना सबसे पुरानी पार्टी को ज्वाइन करुँ? वहाँ का दृश्य देखकर दिल दहल गया. एक तरफ अर्जुन सिंह राहुल बाबा के कपडे इस्त्री कर रहे थे दूसरी तरफ सोनीजी सोफा ठीक कर रहीं थीं. सब लोग इसी प्रकार अपने आप को व्यस्त रख रहे थे. सोनियाजी ब्रश करके निवृत्त हुईं नहीं कि टावेल हाज़िर. चाय का कप टेबल पर रखने तक की जहमत नहीं उठानी पड़ रही थी. मेरे लायक कोई काम बचा ही नहीं था. उनके पैर चूने के लिए भी लाइनें लगीं थीं. सो, उलटे पों लौट आया.

सोचा राजनाथ से मिलूँ. जब यू पी में शिक्षा मंत्री थे तो लाखों क्षात्रों को फेल करवाया था, मैं बस फेल होते होते रहा गया. फिर भी मन मार कर पहुंचा. उनका पहला सवाल था-
"काम क्या करते हो?"
"जी अभी तो बेरोजगार हूँ."
"पार्टी में अभी छंटनी चल रही है. कोस्ट कटिंग हो रही है".
"मैं फ्री में आ जाऊँगा".
"काम क्या करोगे?"
"जो आप कहेंगें".
"यही तो समस्या है कि कोई काम ही नहीं है".
अचानक उनकी नज़र मेरे पॉकेट के कलम पर गयी. डाँटते हुए पूछा-
"लिखने विखने का काम तो नहीं करते हो?"
"नहीं जी.वो तो दस्खत करने के लिए है" मैं झूठ बोल गया.
वे इत्मीनान हो गए.
"सोचना पड़ेगा. पार्टी हाई कमान कि अगली चिंतन बैठक में कोई निर्णय लिया जा सकेगा. तब तक कहीं और ट्राई मार लो".

फिर वहाँ से निकलते ही काफी होउस गया जहां प्रकाश कारत चुस्कियां ले रहे थे. मैंने कहा-
"सर, आप यहाँ?".
वो खिन्न होकर बोले "तो और कहाँ जाऊँ?"
"नहीं नहीं. मेरा मतलब आप आजकल दीखते नहीं. ना अखबारों में ना टीवी पर ही. तो क्या हो रहा है आजकल? कोई किताब विताब ही लिख डालिए खाली टाइम में." जुबान फिसल चुकी थी.
"हमारी पार्टी में लिखने का काम नहीं होता. हम सिर्फ विरोध करते हैं. धरना प्रदर्शन करते हैं हम. किताब लिखना आता तो कोई बड़ी पार्टी ज्वाइन करते. वैसे बीजेपी से ऑफर आया था लेकिन डिस-क्वालिफाईड हो गया. वही सोच रहा हूँ कि क्या किया जाए".
"हाँ, वैसे हु जिंताओ (चीन के प्रेसिडेंट) के रिटायर होने में अभी काफी टाइम है, नहीं तो आप वहाँ भी ट्राई कर लेते". जुबान ने फिर धोखा दे दिया था. उनके रिएक्शन का इंतज़ार किया बिना मैं वहाँ से भाग लिया.

फिर मायावती के यहाँ हो आया. उन्होंने पूछा" कितना देगा?"
"क्या कितना देगा?"
"अरे, चंदा और क्या?". पार्टी ज्वाइन करने की पहली शर्त उनके बर्थ- डे फंड में चंदा करना होता है, उनके पीऐ ने बताया.
"मैं तो बेरोजगार हूँ . ."
"तो सपा ज्वाइन कर ले" और उनकी आवाज़ और भी फट गयी.

अमर सिंह ने समझाया " अरे भाई, यह तो फिल्म स्टार्स कि पार्टी है. तू कहाँ भटक गया इधर?"
शिव सेना और मनसे के लीडरों के गेट पर बड़ा बड़ा लिखा पाया-
उत्तर भारतीयों का प्रवेश वर्जित.

पॉलिटिक्स अपने बस की है ही नहीं. ना चापलूसी करनी आती है, ना जुबान पे लगाम है, ना जुलूस निकालने आता है और ना ही बसों में आग लगाने की कूव्वत ही है. सच में मुझे योग्य लोगों के हाथों में ही देश को सुरक्षित सौपं देना चाहिए.

सो, इस प्रकार पॉलिटिक्स ज्वाइन करने का इरादा देश हित में त्याग दिया.

'शोर्ट कट' का है जमाना

लोग कहते हैं एक पैराग्राफ में अपनी बात लिखो? लेकिन कैसे संभव है? क्या उपन्यास को एक पेज में लिखा जा सकता है? लेकिन भाई, फास्ट फ़ूड का जमाना है सबको जल्दी मची है. कभी कभी सोचता हूँ कल की नस्ल क्या पेशाब करने के लिए 'सुलभ शौचालय' जायेगी या पैंट में ही करा करेगी? आजकल प्यार भी ऐसे ही हो रहा है. "ऐ, जल्दी पटती है तो पट वरना कलटी मार, अपुन के पास ज्यादा टाइम नहीं है". टेस्ट मैच से वन डे फिर ट्वेंटी ट्वेंटी तक आ गए. अब क्या टॉस करवा के ही मैच जितवा दोगे?

एक संघर्षरत युवक कुछ वर्ष पहले मेरे पीछे पड़े थे. हरियाणा से इंजीनियरिंग करके आये थे. मार्शल आर्ट्स में बड़े निपुण थे और बार बार अक्षय कुमार को पटखनी देने की बात करते थे. जल्दी से 'सुपर स्टार' बन जाना चाहते थे. मैंने कहा भाई, किसी ऐसे वैसों को पकडो जिनकी कोई कंवारी बेटी या बहन हो. उसे पता लो फिर हीरो बन ही जाओगे. यही सबसे शोर्ट कट है. फिर पूछने लगे कि किसे पताऊँ? मैंने कहा "सलमान की एक बहन अभी खाली है, किस्मत आजमा सकते हो". अक्सर फ़ोन करके मुझे परेशान करते रहते थे. किस डिरेक्टर की बेटी या बहन जवान हो रही है क्या मैं यही हिसाब करता फिर रहा हूँ? एक दिन पूछने लगे की करण जौहर के यहाँ दाल गल सकती है? क्यूँ? शाहरुख़ क्या इतना बूढा हो गया है? खैर.

लोग करें भी तो क्या? एक दौर था जब टिकेट ब्लैक करने वाले, बस कंडक्टर, झाडू मारनेवाला कोई भी हीरो बन जाता था. कुछ लोग तो हीरोइनों का छाता इसी उम्मीद में ही ढोया करते थे और कामयाब भी हुए. प्रतिस्पर्धा इतनी बढ़ गयी है और आप अभी भी 'कास्टिंग काउच' से घबरा जाते हैं? अब तो हीरोइनें ना तो नदी में डूबती हैं ना सेट पर आग ही लगती है. अब कोई देवानंद या सुनील दत्त कैसे बने?

जेल यात्रा

जेल जाना हर किसी के लिए बेहद जरूरी है. मेरे ख्याल में यह हज जाने या गंगा नहाने से कम नहीं. अगर मन की शांति चाहिए तो जेल जाओ. कामचोरी करके मुफ्त खाना है तो जेल जाओ. यहाँ विभिन्न पेशे से आये लोगों का महासंगम होता है. फिल्म अभिनेता, नेता, व्यवसायी वर्ग, चोर उचक्के सभी. जहां साम्यवाद और समाजवाद का अनोखा उदाहरण मिलता है. जहां दुनिया के मायावी इंद्रजाल से दूर आत्ममंथन और चिंतन का संयोग होता है. और इसमें शर्म की भी क्या बात है? महान लोगों ने जेल को ही अपना कर्मभूमि बनाया था. गांधी, मंडेला, अंग सां सू की, हर्षद मेहता, सलमान खान, जयप्रकाश नारायण कौन नहीं गया जेल? बंधू, महान होना है तो जेल जाओ.

खुद सोचो. अगर नेहरु जेल नहीं जाते तो क्या भारत को समझ पाते? इतनी साड़ी किताबें उन्होंने जेल में रहकर ही तो लिखी? वरुण गाँधी को भी ज्ञान का प्रकाश जेल में मिला. मेरी मानिए आप एक बार जेल हो ही आईये.

Wednesday, August 26, 2009

ट्रायल

मुझे भगवन के दरबार में प्रस्तुत किया गया. पृष्ठभूमि में सुन्दर सुन्दर अधनंगी परियां पंखा झल रहीं थीं. कुछ बेसुरा सा संगीत और नृत्य का प्रोग्राम चल रहा था. सबकी नज़रें मुझे ही घूरे जा रहीं थीं. भगवन ने मुझसे पूछा:

"क्यूँ बे! कैसा लग रहा है?"
"प्रभु! आपको छोड़ यहाँ कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा".
"अच्छा? और मुझमें ऐसा क्या अच्छा लगा?"
"आप दया निधान करुना के सागर, विघ्नहर्ता और सबकी कुंडली तो आप ही बनाते हो".
"मूर्ख. वह ब्रम्हा का डिपार्टमेन्ट है".
"सॉरी. मगर सर्वशक्तिमान तो आप ही हो. ब्रम्हा भी तो आप के ही आधीन हैं." सुनकर भगवन अति प्रसन्न हुए और मंद मंद मुस्कुराते हुए कहा.
"इतनी तारीफ़ तो तुने धरती पर कभी नहीं की? ज़रा रिकॉर्ड देखना रे इसका."
"प्रभो! वहाँ इतना टाइम ही कहाँ मिलता था? नौकरी और छोकरी से कभी फुर्सत ही नहीं मिली. दिन रात कोल्हू के बैल की तरह ...."
"तेरे खाते में तो पुन्य का नामोनिशान ही नहीं. कितना ओवर ड्राफ्ट है तेरा?" उन्होंने मेरी बात काटते हुए आर्श्चय व्यक्त किया.
"हे परम पिता परमेश्वर!"
"पिता किसे बोला रे तू?"
"आप को ही"
"बड़ा सयाना है रे तू. धरती पे किसी और को माई बाप बोलता था और यहाँ आते ही पार्टी बदल ली?"
"वो तो कागजी माई बाप थे. असली तो आप ही हैं नाथ!"
"ओके ओके" टालते हुए और मेरी चालाकी भाँपते हुए कहा.
"स्वामी एक प्रश्न है".
"ऐं? कोई प्रश्न व्रश्न नहीं. यहाँ इसका अधिकार सिर्फ मुझे है," कुछ सोचते हुए "अच्छा चल पूछ ही ले. एक ही पूछना".
"पिछले पांच सालों में प्रमोशन क्यूँ नहीं मिला?"
रिकॉर्ड देखकर उनका सेक्रेटरी बोला
"तुम्हारा पडोसी रोज़ घी के दिए जलाता था प्रभु के फोटो के सामने. और तुम्हारी प्रमोशन ना हो इसकी विनती करता था. पूरे पांच सालों में चार डब्बे शुद्ध घी के दिए जलाए और पैंतीस किलो लड्डू चढाये".
भगवन ने भृकुटी तानकर पूछा-
"आया समझ में?"
"लेकिन कृपालु, लड्डू तो उसी ने खाएं होंगें? आपको थोड़े दिए?"
इस पर चापलूस पसंद भगवन अस्मंज़स में पड़ गए.
"महाप्रभु, जब भी वह फेल होता था सारा कसूर आपको ही देता था. लेकिन कामयाबी का सेहरा खुद ही बांधता था. आपको उसने कभी भी क्रेडिट नहीं दी".
भगवन को मेरे पडोसी पर गुस्सा आने लगा.
"ऐसा क्या?"
"स्वामी, आप तो सिर्फ पिक्चर देखते हो वो भी बिना साऊंड के. धरती की आवाज़ थोड़े सुनाई देती है यहाँ".
इतने में यमराज का हेड क्लर्क भागता हुआ आया.
"महाराज, भारी त्रुटि हो गयी. क्षमा कीजिये. त्रुटिवश दीपक चोपडा की जगह इसको उठा लाये".
मैंने मौका ताड़कर भगवन के पैर जोर से पकड़ लिए. उन्होंने मुझे धरती पर वापस फेंकने का हुक्म जारी कर दिया.

नींद खुली तो मैं बिस्तर से गिरकर जमीन पर पड़ा हुआ मिला.

Thursday, July 9, 2009

परवरिश आजकल

अभी हाल ही में जहाँगीर आर्ट गैलरी गया था. और जब भी जाता हूँ सिर्फ दंग होकर लौटता हूँ. कितना हूनर है लोगों में. कितनी अगाध समर्पण की भावना से लोग काम करते हैं. कितने लोग वक़्त निकलकर जा पाते हैं वहाँ? मैंने देखा नाना प्रकार के लोग वहाँ थे- अनपढ़ भी थे और अँगरेज़ भी. बहुत कुछ तो मेरे पल्ले नहीं पड़ा मगर जो भी था प्रसंशनीय था. सच, सिर्फ पैसा कमा लेना ही सफलता नहीं होती. सिर्फ 'एक्साम' पास कर लेने से हम शिक्षित नहीं हो जाते.

मैं कभी- कभी बहुत निराश हो जाता हूँ जब देखता हूँ कि लोग कितने अज्ञ और अनभिग्य हैं और उन्हें कोई अफ़सोस भी नहीं. वो संतुष्ट हैं अपनी ९-८ नौकरी से. उन्हें कुछ जानने की न तो कोई इच्छा है न चाह. उन्हें क्या कि टगोर ने गीतांजलि में क्या लिखा, विवेकानंद क्या शिक्षा देकर गए, आइंस्टाइन ने भारत के बारे में क्या कहा है? कबीर क्या समझा गए. निखिल बनर्जी कौन हैं और उस्ताद अकबर अली खान कौन थे? NCPA में कौन सा शो चल रहा है? देश के अंदरूनी हिस्सों में क्या हो रहा है?

उनसे पूछो राखी सावंत का शो कब है? हिमेश रेशमिया का नया हिट गीत क्या है. सलमान, कैटरिना से किस बात पर नाराज़ हैं या सैफ अली खान की नई गर्ल- फ्रेंड कौन है, सब बता देंगें.

अब आप किसको दोष देंगें?

लोग थूकते क्यूँ हैं भाई?

लोग थूकते क्यूँ हैं भाई? यह सवाल अक्सर मेरे दिमाग में कौंध जाता है जब भी मैं किसी को थूकता हुआ पाता हूँ. और यह हर रोज़ होता है. जहाँ देखो, जब देखो लोग चपाक से थूक देते हैं. बिना आगे- पीछे देखे बिना. मुझे घिन कम गुस्सा ज्यादा आता है. थूक कर लोग टीबी ही नहीं फैलाते अपितु एक असभ्य समाज का परिचय देते हैं. ऐसे ऐसे स्टाइल, साइज़ और डिजाईन में थूकते हैं कि पूछो मत. जहाँ लिखा हो 'थूकना मना है' वहीँ थूकेगें. रेलवे पूल पर चढ़ते हुए मैं अक्सर बड़े- बड़े, रंग- बिरंगे थूक देखता हूँ तो जी में आता है थूकने वाले को पकड़कर एक जोर से चांटा दूं.

बचपन में पहले मैं भी थूकता था जब कोई भी बदबूदार चीज़ या मरा हुआ जानवर देख लेता या किसी को थूकते हुए देख लेता. और तब तक थूकता था जब तक कि मैं थक नहीं जाता. फिर एक दिन मैंने स्वयं से पूछा 'क्या इससे कुछ फायदा होता है?'. तबसे मेरा थूकना हमेशा के लिए बंद हो गया.

Wednesday, July 8, 2009

दूसरा २६/०८

अमेरिकी इंटेलिजेंस एजेंसियों की मानें तो पाकिस्तानी आतंकवादी संगठन लश्करे तय्यिबा फिर से मुंबई में कहर बरपाने वाला है, जैसा की हम पिछले वर्ष २६ नवम्बर को देख चुके हैं. अगर ऐसा फिर हो भी तो कोई अचम्भा नहीं. मानो हम इसके आदी हो चुके हों या तैयार बैठों हों. कल्पना करने की कोई आवश्यकता नहीं. वही होगा जैसा पिछली बार हुआ था. टीवी चैनलों को एक नया मसाला मिल जायेगा. पलानिअप्पन चिदंबरम को डांट पड़ेगी या ज्यादा से ज्यादा मंत्री पद से हाथ धोना पड़ेगा. नेता लोग टेंसुयें बहायेंगें, पडोसी को भीषण धमकियां दी जायेगीं , अमेरिका से गुहार लगाईं जायेगी, एक जांच कमिटी गठित की जायेगी, सीमा पार से बयानबाजी होगी, लोग मोमबत्तियां जलाने के लिए इकट्ठे होंगें और फिर सब भूल जायेंगें.

ऐसा ही हुआ है और ऐसा ही होता रहेगा. आपका क्या ख्याल है?

Mumbai

बस और ट्रेन के धक्कों से
सीधी हो जाती है कमर

सारा दिन धुल और धुंए से
पेट जाता है भर

और जो रहा सहा होता है
वो सब भूल जाता है पीकर

That’s Mumbai
The city I hate to love.

Saturday, July 4, 2009

एक 'ऑफिस गोअर' की दास्तान

घड़ी ने छ बजाये नहीं कि मेरा ध्यान घर की तरफ अनायास चला जाता है. अगर कोई बहुत जरूरी काम न हो तो ऑफिस में फालतू रुकने का ज़रा भी मन नहीं करता. लेकिन इन बॉस लोगों के पास कुछ काम तो होता नहीं. अब वो बैठें हों तो हम घर जाने की बात सोच भी कैसे सकते हैं? बॉस, रुकना तो पड़ेगा ही. वो लोग तो बैठे बैठे ट्रैफिक कम होने का इंतज़ार करते हैं. . . खैर, दस तक बज जाते हैं निकलतेनिकलते और घर ऐसे पहुंचता हूँ जैसे कोल्हू के बैल छूटते ही भागते हैं.

अब ऐसे में कोई दोस्त मिलने की बात करे तो? कहे चर्चगेट आ जा तो कितनी खुन्नस होगी. सोचिये ज़रा? जब घर पहुँचता हूँ सब सो चुके होते हैं. फटाफट खाकर गिरते ही कब नींद आती है और कब सुबह हो जाती है, पता ही नहीं चलता. अगर फिर से जागना न हो तो अलार्म घड़ी कबका तोड़ कर रख देता. गिरते- पड़ते ऑफिस हमेशा लेट पहुंचता हूँ और बॉस की तिरछी नज़र से बचते बचाते मशीन ऑन करता हूँ. ऑफिस और ऑफिस पॉलिटिक्स की बातें फिर कभी करूंगा. . .

मेरी एक गर्ल फ्रेंड थी जो अक्सर कहीं मिलने की बात करती थी. अगर उसके रूठ जाने का ग़म नहीं होता तो मैं साफ़ मना कर देता. लेकिन उन्हें कौन समझाए. ऊपर से उसे शौपिंग का बहुत शौक था. शौपिंग कम विण्डो शौपिंगज्यादा करती थी. एक- एक चीज़ को खरीदने में घंटों लगा देती लेकिन चेहरे पर मैं शिकन नहीं आने देता था. उसे गुस्सा बहुत आता था. सन्डे मतलब दिन भर सोने की आजादी. लेकिन इश्क़ होने का बाद सोने का मौका ही नहीं मिलता. ऐसा नहीं नींद नहीं आती थी. उसके रूठने का डर होता था वरना अपनी सुहानी नींद को कौन कुर्बान करे?

अक्सर बोलती घुमने चलो. आज तक समझ में नहीं आया मुंबई में घुमने लायक कौन सी जगह है? शोर और धुंए के बीच घूमना कैसा? जहां भी जाओ, भीड़ और ट्रैफिक. मुझे शांति से दो पल बैठना अच्छा लगता है. लेकिन इन लड़कियों को कौन समझाए? फिर अचानक एक दिन उसका रूठना बंद हो गया. अब उसे शौपिंग या घुमाने से भी आजादी मिल गयी. दरअसल मैंने उससे शादी कर ली.

Tuesday, June 30, 2009

लोकल ट्रेन

मुंबई की लोकल ट्रेनों में दो तरह के लोग चलते हैं. एक वो जो चुप चाप धक्का मुक्की बर्दाश्त कर लेते हैं और शांति पूर्वक यात्रा पूरी करते हैं. एक वो जो बस लड़ने को तैयार बैठे रहते हैं. आपने छुआ नहीं की बस गाली गलौज शुरू. फर्स्ट क्लास डब्बों में भी यह सब होता है लेकिन थोडा सभ्य तरीके से. वहाँ भी जब हालात काबू से बाहर हो जातें हैं तो गालियाँ 'हिंदी' में ही दी जाती हैं. जहां तक लेडीज डिब्बों की बात है तो उनकी बात न की जाए तो ही अच्छा है. आप इस कम्युनिटी को तो जानते ही हैं.

ऑफिस जाने के समय और लौटने के समय जो नज़ारा होता है अगर आप पहली बार देखें तो शायद बेहोश हो जाएँ. चूँकि सारे बिज़नस के कार्यालय साउथ मुंबई और टाऊन यानी चर्च गेट से अँधेरी के बीच ही हैं पूरी की पूरी भीड़ इधर ही आती है. लोग घंटों का सफ़र तैय करके विरार, पनवेल यहाँ तक कि कल्याण से इधर आते हैं. कुछ लोग तो रोज सूरत से मुंबई आते हैं. ट्रेनें ठसाठस भरी रहती हैं जैसे बोरे में भूसा भरा जाय. फिर भी लोग घुस ही जाते हैं. लोग अपने तन का पूरा पसीना आपके शफ्फाफ बदन से ऐसे पोंछ लेते हैं जैसे. . . अब क्या बताऊँ? कभी कभी गर्दन सीधी करने के लिए जगह मिल जाए तो अपने आप को खुश किस्मत समझिये.

आमची मुंबई

मुंबई में कोई भी इंसान भूखा नहीं मर सकता. यहाँ सबके लिए अवसर है बस यह आप पर निर्भर है कि आप उसे पहचान पाते हैं या नहीं. हर जगह छोटे छोटे स्टाल लगाये लोग मिल जायेंगें- भेल पूरी, ताजे फूल, फिल्मों की सीडी, डीवीडी, करी पत्ते, केले, नीम्बू पानी इत्यादि. ऐसी ऐसी चीज़ें जिनकी आप कल्पना भर कर सकते हैं. ऑफिस जाते लोगों के लिए सुबह सुबह नाश्ता स्टेशन के पास उपलब्ध मिलेगा. लंच के वक़्त फलों का सलाद आपके ऑफिस के गेट के ठीक बाहर. कदम कदम पर रेस्तरां, जहां सस्ते भोज़न और खाने पीने की चीज़ें आपके मुंह को आराम करने का मौका नहीं देंगीं. ये सब चीज़ें तो हर बड़े शहर में मिल जाती हैं लेकिन मुंबई की खास बात है सिर्फ पांच रुपये में बड़ा पाव या दस रुपये में एक प्लेट इडली या मेदू बड़ा. यानी चट पट भोज़न कीजिये और काम पर चलिए.

अब ऐसे में आप साफ़ सफाई की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? बेशक़ बाकी विदेशी शहरों जैसे न्यू यार्क, लन्दन या शंघाई के मुकाबले मुंबई निहायती गन्दा है. बिडम्बना ही है कि लगभग हर बहुमंजिली इमारत को घेरे हुए 'चालें' दिखेगीं. पर मुंबई में सिर्फ झुग्गियां ही नहीं हैं, यहाँ गगनचुम्बी इमारतें भी हैं. साउथ मुंबई जहाँ कोलाबा और नरीमन पॉइंट जैसे बिज़नस हब हैं, जहाँ भारत के सबसे सम्पन्न व्यावसायिक परिवार जैसे अम्बानी और टाटा रहते हैं तथा कंपनियों के हेड ओफिसेस हैं. एक अलग 'एहसास' मिलता है जो ब्रिटिश साम्राज्वाद की निशानी हैं.

नेट्वर्किंग

कहते हैं बिना नेट्वर्किंग के कुछ भी नहीं होता. चाहे जिस फिल्ड में आप हों बिना जान पहचान के कुछ नहीं होता. यही सोचकर मैंने भी जान पहचान करनी शुरू की. जब कभी किसी से मिलता हूँ उसका बिज़नस कार्ड जरूर लेता हूँ. इस उम्मीद में कि कुछ काम आ जाएगा. लेकिन जब काम पड़ती हैं तो लोग अनजान बन जाते हैं. मेल का जवाब नहीं देते और फ़ोन उठाना बंद कर देते हैं या कहते हैं बाद में कॉल करूंगा और नहीं करते हैं. एक बार ट्रेन में एक सज्जन मिले. बोले: मैं बहुत बड़ा बिज़नस मैन हूँ और कोलकाता चीफ मिनिस्टर से मिलने जा रहा हूँ. सुभाष घई, अनु मलिक उनके दोस्त हैं और रोज उनके साथ गोल्फ खेलतें हैं. हाल ही में वो सब लन्दन में छुट्टियाँ मना कर लौटे हैं. उन्होंने अपने घर का दो पता दिया. दोनों घर जुहू में ही थे. घर से वापस लौटते ही मैं उनके घर मिलने गया. पता तो सही था लेकिन घर उनका नहीं था. फिर फ़ोन पर बहुत कोशिश की लेकिन वे हमेशा व्यस्त होते थे या फ़ोन ही नहीं उठाते थे. मैं समझ तो गया थाकि माज़रा क्या है लेकिन फिर भी एक उम्मीद थी शायद बात बन जाए.

कई सारे ऐसे दोस्त भी बन जाते हैं जिनसे फ़ोन पर लम्बी बातें हो जाती हैं लेकिन चेहरा बिल्कुल याद नहीं रहता. अगर हम कभी रास्ते में मिल भी जायें तो सामने से निकल जायेंगें लेकिन पहचान नहीं पायेंगें. जिनको पहचानते हैं उनसे भी कभी मिलना कहाँ होता है? आजकल किसके पास वक़्त है? बात हो जाए यही बहुत है. मेरे कुछ रिश्तेदार यहीं मुंबई में रहते हैं और पिछले चार सालों में शायद ही कभी मेरी सुध ली हो.

Monday, June 29, 2009

मुंबई डायरी

हर शहर की एक धुन यानी रिदम होती है. और इस शहर में रहने वाले हर शख्स को उस धुन पर चलना होता है. अगर मुंबई के रिदम की तुलना लहरों से की जाए तो यह समुंदर की लहरों की तरह हमेशा तेज़ गति से बहती रहती है जहाँ ठहराव के लिए कोई जगह नहीं. यहाँ कोई रुकता नहीं हैं सिर्फ चलता है लगातार साँसों की तरह, धडकनों की तरह. बारिश हो, बाढ़ आ जाये, और शहर डूब जाये या बम कहर बरपा दें. यह शहर अपनी ही धुन में जीता है बिना किसी अर्ध या पूर्ण विराम के. यहाँ सब मिलता है. बड़ा पाव, गन्ने का रस, कच्चा चना, आम रस, छास, डोसा, इडली, पंजाबी, चाईनीज़, इटालियन, कांटिनेंटल हर तरह का स्वाद.

मुंबई की बात हो और मुंबई लोकल का जिक्र न हो, मुमकिन नहीं. अगर आप मुंबई आयें और लोकल ट्रेन में सफ़र न करें तो आपकी यात्रा अधूरी ही रहेगी. आप सोचेंगें की आखिर ऐसी क्या बात है इसमें. तो जनाब यहाँ आपको पूरा भारत दर्शन हो जायेगा. आप ज़िन्दगी को करीब से देख पायेंगें. हर तबके के लोग, हर राज्य के लोग, हर नस्ल और भाषा से रूबरू हो सकेंगें. ऐसा मुंबई में ही हो सकता है जब आप के दाहिने कोई गुजराती में बात करता मिलेगा तो बायें तमिल में. आपके पीछे भोजपुरी सुनने को मिलेगी तो आगे इंग्लिश मेंगालियाँ.

मैं इस प्लेटफोर्म से मुंबई और उसके लोगों के बारें में बात करूंगा.