Friday, November 15, 2013

सोया हुआ शहर: मुम्बई

कहते हैं कुम्भकर्ण छः महीने सोता था और छः महीने जगता था। विडम्बना देखिये इस शहर का। जो शहर कभी सोता नहीं उस शहर के बाशिंदे कभी जागते ही नहीं। चारों तरफ लूट मची है। भ्रष्टाचार, अनाचार और कदाचार एवं आपराधिक घटनाओं की भरमार है। फिर भी किसी को अपने से ही फुर्सत नहीं। इस शहर में जगह-जगह भयानक गड्ढे हैं। हर बरसात में कमर तक पानी लग जाता है। पीने के पानी की किल्लत हर गली-नुक्कड़ में है। सड़कों पर सड़े -गले कचरों की दुर्गन्ध से सारा वातावरण प्रदूषित रहता है। ट्रेन हो या बस, धक्के खाने की आदत तो इस शहर की नियति बन चुकी है। लगभग अस्सी लाख लोग मुम्बई की लोकल ट्रेनों में प्रतिदिन 'सैंडविच' बनते हैं तथा दस लोग प्रतिदिन भगवान् को प्यारे हो जाते हैं। औसतन ढाई हज़ार लोग प्रत्येक वर्ष लोकल ट्रेनों से कट कर मौत के शिकार हो जाते हैं। प्रतिदिन दो व्यक्ति रोड एक्सीडेंट में मर जाते हैं। आयकर वसूली का ३३ प्रतिशत, सीमा-शुल्क आय का ६० प्रतिशत तथा उत्पाद-शुल्क राजस्व का ४० प्रतिशत मुम्बई शहर से आता है। लेकिन मूलभूत सुविधाओं के नाम पर यहाँ के निवासियों को क्या मिलता है? मुम्बई की आधी आबादी गन्दी बस्तियों एवं झुग्गियों में रहती है। २०२० तक मुम्बई दुनिया का दूसरा सबसे अधिक आबादी वाला शहर बन जाएगा। क्या हम एक बेहतर शहर, बेहतर बुनियादी सुविधाओं की अपेक्षा कर सकते हैं? ज़रा सोचिये तो।  

पहली बार मेरी झड़प अखबार बेचनेवाले यादव से हुई थी। वह अखबार पहुँचाने के दस रूपये मांग रहा था। यह मेरे लिए नया अनुभव था क्योंकि दिल्ली या गुडगाँव में मैंने कभी भी अतिरिक्त शुल्क नहीं दिया था. अन्तोगत्वा यादव को हार माननी पड़ी। जब अपना घर लिया तो फिर वही किचकिच। हद तब हो गयी जब सर्विस चार्ज के नाम पर २५ रूपये की मांग की गयी। खैर, मैंने कभी हार नहीं मानी। अख़बार वाला आज भी मात्र अखबार के ही पैसे लेता है और सेवा शुल्क की बात नहीं करता। 

दिल्ली के ऑटो रिक्शावाले तो बदनाम हैं ही। मीटर से नहीं चलते। मुम्बई के ऑटो वाले भी बदमाशी करने लगे हैं। कम दूरी हो तो नहीं जाना। लम्बी दूरी हो तो भी समस्या है। इस मार्ग में बहुत गड्ढे हैं। उस तरफ बहुत ट्रैफिक है। कुछेक स्थानों पर 'शेयर्ड रिक्शा' का चलन है। लेकिन अधिक कमाई के उद्देश्य से तीन सवारियों के स्थान पर पांच लोगों बिठाने का प्रयास किया जाता है। यहाँ क़ानून के ठेकेदार आड़े आ जाते हैं। मसलन, अँधेरी स्टेशन से वीरा देसाई मार्ग तक कभी-कभी तीन-तीन पुलिसवालों को 'प्रसाद' देना पड़ता है। कुछ पुलिसवाले तो खुलेआम पैसे खा लेते हैं। लेकिन कुछ ने इसका सुरक्षित तरीका ढूंढ लिया है। पहले रिक्शेवालों से उनके पेपर्स ले लिए जाते हैं फिर 'प्रसाद' देने के पश्चात उनके पेपर्स लौटा दिए जाते हैं। 

मुम्बई के लोगों की उदासीनता का एक और नमूना देखिये। मुम्बई में तक़रीबन ६० लाख लीटर दूध की प्रतिदिन खपत होती है। दिल्ली तथा पुणे में जहाँ अधिकतम खुदरा मूल्य पर ही दूध बेचे जाते हैं मुम्बई, नवी मुम्बई एवं थाणे में दो से तीन रूपये प्रति लीटर अधिक वसूले जाते हैं। आपके पास कोई उपाय नहीं। या तो प्रति लीटर दो-तीन रूपये अधिक दीजिये या रास्ता नापिये। दुःखद यह है कि यह लूट सरकारी तंत्र और आला अधिकारियों की नाक के नीचे हो रहा। सुनने में आया है कि थाणे में दूध-विक्रेताओं ने 'अमूल' दूध बेचने से न केवल मना कर दिया है अपितु उसके क्षेत्र में प्रवेश भी निषेध कर दिया है। प्रतिस्पर्धा के कारण तथा विक्रेताओं के ऐसे रवैये से दूध कम्पनियाँ भी स्वं को असहाय पाती हैं। मदर डेयरी दिल्ली की भांति मुम्बई में भी अपनी इकाई स्थापित करना चाहती है लेकिन महाराष्ट्र सरकार उन्हें इसकी अनुमति नहीं देती, जमीन उपलब्ध नहीं कराती। सरकार और सरकारी तंत्र का यह ग्राहक-विरोधी रवैया समझ से परे तो है ही यहाँ के लोगों की उदासीनता चकरा देता है।       

यही समय है जब आम लोग अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागें।  

Thursday, October 4, 2012

बात मल्टीपल पार्टनर्स की

'बर्फी' फिल्म समाप्त होने पर जब हम लोग सिनेमा हाल से निकले मेरे मन में यही प्रश्न था। आखिर बर्फी ने श्रुति को क्यों नहीं अपनाया? उसने झिलमिल से शादी क्यूँ रचाई। माना कि पहले श्रुति बर्फी के प्रेम को अपनाने की हिम्मत नहीं जुटा पायी। क्योंकि वह एक भावुक लड़की थी और बर्फी जैसे गूंगे और बहरे के लिए हमदर्दी भी थी लेकिन पारिवारिक, सामाजिक दबाबों तथा चालाक कुतर्को के आगे उसकी एक न चली। हर कोई अपने लिए बेहतर और खुशहाल जीवन की कामना करता जो वास्तव में कई बार भावनाओं पर काबू रखकर फैसले करने पर बाध्य कर देता है। देर से सही उसने बर्फी की ज़िन्दगी में वापस लौटने का निर्णय तो लिया परन्तु तब तक देर हो चुकी थी और बर्फी को झिलमिल से प्रेम हो जाता है। बर्फी को यह ध्यान क्यों नहीं आता कि श्रुति अपना बसा बसाया घर और संसार छोड़कर उसके पास आई थी? श्रुति सुन्दर है, ज्यादा शिक्षित और शारीरिक तथा मानसिक रूप से अधिक सक्षम भी। शायद, वह इस बात को कभी नहीं भुला पाता है कि वह एक बार उसे छोड़कर जा चुकी थी। उसे झिलमिल अधिक भरोसेमंद लगती है। 

अगर मैं बर्फी होता तो दोनों को अपना लेता। आखिरकार मर्द दो या दो से अधिक पत्नियां रखते आये हैं। मेरे मित्र ने प्रश्न दागा। "अगर तुम्हारी पत्नी भी दो पति रखे तो तुम उसे स्वीकार कर पाओगे?" मेरे मित्र भी दो पत्नियां रखने का विचार मेरे समक्ष कई बार प्रकट कर चुके हैं। चूँकि उस समय उनकी मंगेतर उनके साथ थीं, शायद 'इम्प्रेशन' बनाने के लिए उन्होंने ऐसा किया हो। वैसे जब आपके पास दो विकल्प हों और दोनों ही उम्दा हों तो निर्णय कर पाना सरल नहीं होता है। मैंने कहा "मर्द दो बीवियां रखते आये हैं। और मुझे अपनी बीवी शेयर करने का ख्याल भी नागवार है।" वैसे बीवियां शेयर करना यकीन मानिए न तो सामाजिक है (कुछ अपवादों- महाभारत की द्रौपदी-पांडव तथा कुछ जनजातियों में प्रचलित प्रथाओं, को छोड़कर) न ही प्राकृतिक। मनुष्य को छोड़कर अन्य प्राणियों में एक से अधिक 'साथी' रखना आम बात है। कई जानवरों में स्वछन्द रूप से सम्भोग का आनंद लिया जाता है। 'थ्रीसम सेक्स' अमूमन प्रत्येक नस्ल में देखने को मिलता है। 

प्रश्न यह है कि आखिर एक मादा अनेक नरों से सम्भोग क्यों करती है जबकि उसे संतानोपत्ति किसी एक नर से ही होनी है? एक अध्ययन के अनुसार ग्रे माउस लीमर्सएक प्रकार के बन्दर, में मादाएं विभिन्न नरों से संपर्क करती हैं और उनमें सबसे अच्छी किस्म के शुक्राणु व जींस वाले नरों की पहचान करने की क्षमता होने के कारण उन्हीं से गर्भवती होती हैं। 'साईन्स' में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन के अनुसार अनेक नरों से सम्भोग यानी बहुपतित्व मादाओं को स्वार्थी जींस को संतानों में ले जाने से रोकने में सहायक होता है। मधुमक्खी रानी व दीमक रानी के बारे हम सब जानते ही हैं। उसी प्रकार शेरों में ताकतवर राजा नर अनेक शेरनियों से सम्भोग करता है ताकि उसी की नस्ल आगे बढ़े। 

कुछ चिम्पैंजी बंदरों में 'रेव' पार्टी आयोजित होती है जहाँ प्रत्येक नर और मादा को एक दूसरे से और सामूहिक रूप से सम्भोग करने की छूट होती है। इस प्रकार उनमें सामाजिक तनाव कम करने में मदद मिलती है। टोपी हिरणों में तो मादाएं स्मार्ट और सुन्दर नरों का मरते दम तक पीछा करती हैं। यहाँ तक कि उन्हें कई बार सम्भोग के लिए मना करना पड़ता है। कुछ मादा गौरैयों में विवाहेत्तर संबंध रखने की होड़ सी होती है। 

कुछ प्रजातियों में मादाओं का शासन चलता है तो कहीं नरों का ही आधिपत्य होता है। मनुष्यों में भी औरतें स्मार्ट, सुन्दर, बुद्धजीवी और धनवान मर्दों के पीछे पागल रहती हैं। अगर कोई यशस्वी या विख्यात पुरुष हो तो औरतों को फिर न उम्र से फर्क पड़ता है न सूरत से। कभी-कभी यह अंतर पचास साल से भी अधिक का होता है। परन्तु अधिकाँश स्त्रियाँ अपने पति को शेयर करना पसंद नहीं करतीं हैं। आखिर एक ही छत के नीचे दो समझदार स्त्रियाँ क्यों नहीं रह सकतीं?







Saturday, July 28, 2012

देश के युवा मुसलमानों से अपील

कहते हैं हर मुसलमान आतंकवादी नहीं होता लेकिन हर आतंकवादी मुसलमान जरूर होता है. आप, मैं या हम में से ज्यादातर लोग अमूमन मार- काट और खूनी संघर्ष से दूर ही रहना पसंद करेगें. लेकिन जिनके साथ जुल्म हुआ हो वो भले ही तैश में आकर दहशतगर्दी करें लेकिन उन्हें बाद में इसका अफ़सोस भी होता है. कोई भी मुसलमान शौक से आतंकवादी या दहशतगर्द नहीं बनता. उन्हें परिस्थितियाँ बना देती हैं. ज्यादातर युवा विशेषकर वो जो दंगो से प्रभावित हैं, जिन्होंने अपना सब कुछ खोया है वे पूरे सामाजिक तंत्र से बदला लेने की ठान लेते हैं. और यह स्वाभविक भी है. लेकिन कुछ लोग गरीबी और लाचारी से त्रस्त होकर भी इसे पेशा बना लेते हैं जैसे मुंबई के २६/११ नरसंहार के महानायक कसाब. कुछ लोग तो शीघ्र से शीघ्र दौलत और शोहरत की बुलंदियां छूने के लिए शौक से शोर्ट कट के तौर पर इसे अपनाते हैं, मसलन दाउद इब्राहीम. कारण जो भी हो आप कैसे भी इस निर्मम आतंकवाद को उचित नहीं ठहरा सकते- चाहे धर्म के नाम पे या व्यक्तिगत वैचारिक कारणों से. मुझे आश्चर्य तब होता है जब पढ़े लिखे लोग भी इन गतिविधियों में शरीक होते हैं. मुझे याद है जब ९/११ में वर्ल्ड ट्रेड टॉवर ध्वस्त हुआ था उस वक़्त मैं जवाहरलाल विश्वविद्द्यालय के एक छात्रावास में यह सब लाईव टी. वी. में देख रहा था. वहाँ मैंने कुछ बुद्धजीवी मुसलमानों को इतना उद्द्वेलित होते देखा कि मैं दंग हुए बिना नहीं रह सका. गोया, बुश ने उनके घरों पर बम गिरा दिया हो. बुश ने बेशक गलत किया हो लेकिन उन मुसलमानों की प्रतिक्रिया हैरान कर देने वाली रही. कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपने को भारतीय बाद में पहले मुसलमान समझते हैं. उन्हें अपने देश की समस्याओं से अधिक पेलिस्तीन की समस्याएं अधिक परेशान करती हैं. उन्हें अपने देश के लोगों के मरने से ज्यादा गैर-मुल्कों के मुसलमानों की मौतें खासतौर पर पश्चिमी देशों के हमले में हुई मौतें ज्यादा दुःख देती हैं. किसी भी निर्दोष व्यक्ति की मौत चाहे वो किसी भी देश या मज़हब का हो, निःसन्देश दुखद होती है. लेकिन उनका भेदभावपूर्ण रवैया मुझे आतंकित कर देता है. हमारे पडोसी मुल्कों में भी हिन्दू मारे जाते हैं लेकिन हम उनके लिए तो ग़मी नहीं मनाते न ही जिहाद करने की बात करते हैं? कश्मीर से पंडितों का सफाया कर दिया गया, और हम हिन्दुओं ने क्या किया? अफ़सोस. तो क्या हिन्दू कायर होते हैं? पता नहीं. मुझे तो सद्दाम, ओसामा और गद्दाफी के मृत शवों ने भी कुछ देर के लिए व्यथित कर दिया था. 


भारत में कई दंगें हुए हैं और आगे भी होते रहेंगें. यह मानवीय संघर्ष का सिलसिला हमेशा से चलता चला आ रहा है और आगे भी निः संदेह चलेगा. शुक्र मनाईये कि 'सांप्रदायिक दंगा बिल' अधिनियम नहीं बना अन्यथा सोनिया गांधी की कृपा से भारत में बहुसंख्यक और अधिक असुरक्षित हो जाते. हर दंगे के लिए आखिर आप बहुसंख्यकों को ही कैसे जिम्मेदार ठहरा सकते हैं? निः संदेह मुसलमानों को भारत जैसे धर्म निरपेक्ष देश में बराबरी का अधिकार है. लेकिन क्या उनका रवैया उत्तेजित करने वाला नहीं होता? शायद १९९८ में 'सहारा कप' के दौरान मैंने इलाहाबाद में देखा था कि कैसे सैकड़ों मुसलमानों ने भारत के हारने पर भड़काने वाले अंदाज़ में जश्न मनाया था. मुझे यकीन नहीं हुआ था उन मुसलमानों में इस कदर भारत के प्रति घृणा भरी है. मेरे अपने पूर्वी उत्तर प्रदेश के मऊ क्षेत्र में कुछ मुस्लिम बहुल इलाकों में मुसलमानों का जबरदस्त खौफ है. वहां से कई हिन्दुओं को पलायन करना पडा क्योंकि वे उनके बीच असुरक्षित महसूस करते थे. उन्हें अपने हिन्दू पर्व मनाने की अनौपचारिक रूप से अनुमति नहीं होती. वहाँ राह चलते हिन्दू लड़कियों से छेडछाड बड़ी आम बात है. ऐसे कई सारे मामले भारत के अन्य मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में, विशेषकर पश्चिम बंगाल में, प्रकाश में आई है. वर्ग संघर्ष आम बात नहीं है जैसा कि मैंने पहले उल्लेख किया. हिन्दू आपस में लड़ते रहे हैं और मुसलमान आपस में. फिर हिन्दू और मुसलमानों के वर्ग संघर्ष को लोग नए दृष्टिकोण से क्यों देखते हैं?      

अन्य किसी भी इस्लामिक देशों के विपरीत भारत के अल्पसंख्यकों, मुसलमान अल्पसंख्यक वर्ग के पर्याय बन गए हैं मानों सिख, जैन, बौध अस्तित्व में हैं ही नहीं, को हिन्दुओं के जितना ही बराबर का अधिकार प्राप्त है. बल्कि कई बार उन्हें ज्यादा तरजीह दी जाती है क्योंकि वे संख्या में कम हैं और हम धर्म निरपेक्ष बनने के चक्कर में और अधिक उदार बन जाते हैं. अफ़सोस यह छदम निरपेक्ष नेता ही धार्मिक उन्माद फैलाने के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं. जातिगत समरसता बढाने वाले ही जातिगत वैमनस्य बढाने के कारण हैं. अतः देश के मुसलमानों को यह भेदभाव का रोना रोने से पूर्व अपने पड़ोस के इस्लामिक देशों में अल्पसंख्यकों पर हो रहे यातना को भी ध्यान में रखना चाहिए. उन्हें बाबरी मस्जिद के टूटने पर शोक मनाने से पहले याद करना चाहिए कि 
किस तरह अनगिनत मुसलमान आक्रमणकारियों ने भारत की इज्जत- आबरू, धन- संपदा को कितनी बर्बरतापूर्वक लूटा. कितने लाख हिन्दू मंदिरों को नष्ट कर दिया. कितने हिन्दू औरतों को वेश्या बना दिया और कितने लाखों हिन्दुओं को इस्लाम कबूल करने पर मजबूर कर दिया. आज आपकी ९५% आबादी उन्ही हिन्दुओं में से आई है. फिर एक विवादस्पद मस्जिद टूटने पर इतना हो हल्ला क्यों? मैं किसी भी तरीके इस विद्हंस  की  सराहना नहीं करता, न ही मैं इस कायरतापूर्ण कार्य को उचित ठहरा रहा हूँ. मैं कुछ सवालों के जवाब तलाश रहा हूँ बस. दलितों ने जिस प्रकार ऐतिहासिक त्रुटियों को सुधारने के लिए आरक्षण का प्रावधान करवाया उसी प्रकार कुछ ऐतिहासिक त्रुटियों को दुरूस्त करने के लिए कुछ प्रचंड हिन्दुओं ने एक अफगानी आक्रमणकारी के द्वारा मंदिर तोड़कर बनवाई गयी मस्जिद को ध्वस्त कर प्रतिशोध लिया था. लेकिन अफ़सोस अक्सर कुछ उदंड लोगों की उदंडता का परिणाम निर्दोष मनुष्यों को भुगतना पड़ता है. 

हर कारण (cause) का परिणाम (effect) भी होता है. १९९२ में कुछ उदंड हिन्दुओं की वजह से मुंबई में मुसलमानों ने घातक विस्फोट को अंजाम दिया. फिर २००२ कुछ मुसलमान दरिंदों की वजह से गुजरात दहल गया जब उन्होंने हिन्दू भक्तों को जिन्दा जला दिया और परिणामस्वरूप २,००० निर्दोष मुसलमान ख़त्म हो गए. आँख के बदले आँख की नीति से पूरा विश्व अंधा हो जाएगा. उन ओसामा बिन लादेन, मुल्ला ओमर, जवाहिरी, हफीज सईद, मुहम्मद सलाउद्दीन जैसे होनहार योद्धाओं से मेरा यह प्रश्न है कि
उनका खून सद्दाम, गदाफी, मुबारक जैसों के प्रति क्यों नहीं खौला? तब आप कहाँ थे जब सद्दाम ने तक़रीबन तीन लाख लोगों का क़त्ल करवा दिया था या गद्दाफी ने लगभग ५०,००० मुसलमानों को २०११ के विद्रोह में मौत की नींद सुला दी थी या मुबारक ने अनगिनत मुसलमानों के हलाल कर दिया था? और अभी आजकल सीरिया में उनका अपना ही मुसलमान भाई असद अब तक १७,००० निर्दोषों का खून पी चुका है. आप क्या कर रहे हैं? आप को कश्मीर या भारत में नहीं वरन वहां जिहाद करना चाहिए जहाँ औरतों को सूअर से भी बदतर ज़िन्दगी नसीब नहीं. मेरा उन सब जिहाद के नाम पर निर्दोषों की ह्त्या करने वालों से अनुरोध हैं कि वे भारत जैसे शांति प्रिय देश को न छेड़े. हमें शान्ति से जीने दें. दिग्भ्रमित मुसलमानों से अपील है वे मूल धारा में शामिल होकर एक अच्छा इंसान, अच्छा भारतीय और फिर एक अच्छा मुसलमान बनें.  


Monday, April 9, 2012

मनमोहन-जरदारी वार्तालाप का ट्रांसक्रिप्ट

जरदारी साब हाल ही में भारत अपने दल बल के साथ निजी यात्रा पर आये थे. प्रस्तुत है उनकी प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह के साथ हुई बातचीत का सक्षिप्त विवरण.
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जरदारी: मनमोहन पाजी, देखिये न! आपके और हमारे देश में कितना कुछ कामन है. मसलन भ्रष्टाचार. लेकिन आपके मुल्क को तो मान गए. इतने बड़े घोटाले करना हमारे मुल्क के लिए मुमकिन नहीं. सुना है कि लाखो करोड़ों के वारे न्यारे हुए हैं. अजी हिंदुस्तान हिंदुस्तान है और पाकिस्तान पाकिस्तान. दिल बहुत कचोटता है साब. ऐसे मौके हमें कहाँ नसीब.
मनमोहन: वो तो है जरदारी साब. लेकिन हमारा मुल्क भी तो बड़ा है. और वैसे भी बड़े बड़े देशों में बड़े बड़े घोटाले भी तो होंगें न? लेकिन मेरा यकीं मानिए मैं सोलह आने ईमानदार हूँ. कभी एक पैसे भी नहीं खाए.
जरदारी: अजी छोडिये भी. आज के जमाने में ऐसी ईमानदारी किस काम की? बड़े नेताओं के पेट भी बड़े होते हैं. और बरखुरदार ऐसे मौके बार बार नहीं आते. कुर्सी बड़ी बेवफा चीज़ है. एक दफा हाथ से फिसली तो फिर खुदा ही मालिक. नवाज़ को आपने देखा ही. इस मुशर्रफ को भी देख ही रहे हैं.
मनमोहन: बात तो सच कह रहे हो जी. लेकिन हमारे मुल्क में वैसी बात नहीं. यहाँ इतना बुरा....
जरदारी: (बात काटते हुए). पाजी खाना है बहुत लजीज. कुछ पैक भी करवा दीजियेगा गिलानी के लिए.
मनमोहन: क्यों नहीं जी. जरदारी साब आपसे ...
जरदारी: (बात काटते हुए). ऐसे खाना बहोत दिनों बाद नसीब हुआ है. बरसों पहले लाहोर में खाया था. तब हमारी मोहतरमा जिंदा थी (थोड़े जज्बाती हो जाते हैं).
मनमोहन : (टोकते हुए) मुझे अफ़सोस है. लेकिन आइये कुछ अहम् मसलों पे भी बातें हो जायें.
जरदारी: अजी, बातें शातें तो होती रहेगीं. वो भी कर लेंगें. (बिलवाल की तरफ मुखातिब होते हुए) है न बहुत लजीज खाना, पुत्तर?
मनमोहन: आतंकवाद को रोकने के लिए आप कुछ करते क्यूँ नहीं?
जरदारी: (बात काटते हुए). इक बात बताओ पाजी. आप एक ही रंग के कपडे पहन पहन के बोर नहीं होते? एक बार बुश ने भी मुझसे पूछ लिया था कि इस मनमोहन के पास कपडे नहीं हैं क्या? (खी खी खी....मजाक कर रिया था मैं तो).
मनमोहन: आतंकवाद...
जरदारी: आप तो वहीँ के वहीँ अटके पड़े हैं. अरे जो करना है अमेरिका कर रहा है न. ईमानदारी से कहूं तो ये अपने बस की बात है ही नहीं. मेरी तो न आर्मी सुनती है न आई एस आई. सच तो ये है मेरी खुद की सरकार भी नहीं सुनती. बस, यूँ समझिये कि जो आपका हाल है वही हमारा भी है.
मनमोहन: आपको इतने सारे सबूत दिए हमने. आप फिर भी रट लगाते हो सबूत नहीं मिले? (थोड़े गुस्से से, लेकिन मनमोहन खुद को भी आश्वस्त नहीं कर पाए कि उन्होंने गुस्सा किया था कि नहीं. या वो गुस्से में प्रतीत हुए भी थे कि नहीं क्योंकि जरदारी हड्डी मज़े से चूसते जा रहे थे).
जरदारी: खाना सच में है बहुत लाजबाब. आ! हाहा!!.
मनमोहन: हाफ़िज़ सईद को सजा क्यों नहीं दिलाते?
जरदारी: साब समझने की कोशिश कीजिये. हमने उसको छुआ भी नहीं कि समझिये सरकार की चूलें हिल जायेंगी. वो हमारे..वो आप लोग क्या कहते हैं...धरम गुरु...वो हैं. बड़ा रेस्पेक्ट है साब उनका हमारे यहाँ. हम जानते हैं आदमी है बड़ा खतरनाक. सबूत हमारे पास भी है लेकिन मजबूरी है. कुछ ऐसा पुख्ता सबूत दीजिये जो हमें भी न मालूम हो. फिर देखिये हम एक्शन कैसे नहीं लेते हैं.
मनमोहन: मुझे अफ़सोस है आपके १२४ सिपाही वर्फ में दबकर मर गए.
जरदारी: ऐसा क्या? कब हुआ ऐसा? ओहो. खैर छोडिये. जवान होते ही हैं सरहद पर मरने के लिए. आखिर पगार किस बात की लेते हैं. खाना बहुत जायकेदार था. छक के खाया मैंने तो. अच्छा, और कुछ है बात करने के लिए है आप के पास?
मनमोहन: नहीं मेरे पास तो कोई टोपिक नहीं.
जरदारी: मैं शायद कुछ भूल रहा हूँ. कुछ तो था जो बहूत अहम् था. अरे हाँ याद आया. कश्मीर.....
मनमोहन: हाँ. वहाँ मौसम बहुत अच्छा चल रहा है.
जरदारी: चलो अच्छा है. पाजी, अब आप भी कभी हमारे यहाँ आइये. अच्छा होगा आप इन्डियन क्रिकेट टीम को भी वहाँ खेलने भेजें.
मनमोहन: जी जरूर. आप राहुल बाबा को ले जाइये. क्रिकेट तो नहीं पर फिलहाल लूडो तो खेल ही सकते हैं ये दोनों बालक.
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तदुपरांत एक प्रेस रिलीज जारी हुआ.

दोनों देश के नेताओं ने लगभग हर महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातचीत की- आतंकवाद, भ्रष्टाचार, कश्मीर, क्रिकेट और सियाचिन. बातचीत बहुत अच्छे माहौल में हुई तथा काफी संतोषजनक रही. राष्ट्रपति जरदारी ने मनमोहन सिंह को पकिस्तान आने का न्योता दिया जिसे उन्होंने स्वीकार भी कर लिया.

Thursday, February 23, 2012

गहराता बिजली संकट

घंटों बिजली कटौती से न सिर्फ आम नागरिक अपितु कार्पोरेट क्षेत्र और उद्योग भी परेशान हैं. अनियमित और अपर्याप्त बिजली आपूर्ति किसी अंचल या राज्य विशेष की नहीं वरन एक राष्ट्र व्यापी समस्या बन चुकी है. यह न केवल हमारे दैनिक जीवन को बुरी तरह प्रभावित करती है, देश की आर्थिक विकास की गति को भी अवरोधित करती है. यह इतना नियमित सा हो गया है कि बिजली के अभाव में हम जीने के आदी हो गए हैं और हमने मान लिया है कि सोलह घंटे अंधकार में रहना ही हमारी नियत है. किसी दिन दो घंटे अधिक आपूर्ति हो जाये तो एक सुखद आश्चर्य सा होता है. जरा सोचिये, क्या हमें चौबीसों घंटे बिजली नहीं मिल सकती? आखिर ऐसी क्या अडचने हैं आइये इस पर गौर करें.

वर्तमान स्थिति
साठ के दशक में हाइड्रोइलेक्ट्रिक बांधों के निर्माण पर अत्यधिक जोर दिया गया किन्तु धीरे धीरे कोयला आधारित (थर्मल) बिजली उत्पादन पर ज्यादा बल मिला और परिणामस्वरुप हाइड्रोइलेक्ट्रिक आधारित बिजली का योगदान ५० प्रतिशत से घटकर वर्तमान में १४ प्रतिशत पर आ गया है. हालांकि हाइड्रोपॉवर की भारत में उपस्थित असीमित संभावनाओं के बावजूद उनका समग्र विदोहन एक दिवा स्वप्न जैसा ही है. अधिकांश बिजली का निर्माण कोयले के द्वारा ही होता है और भविष्य में होने वाला ज्यादातर उत्पादन (लगभग ७० प्रतिशत) नए कोयला आधारित सयंत्रो से ही होने वाला है. एक अनुमान के तहत, तेरहवीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक तक़रीबन ३७० गीगावाट की बिजली उत्पादन क्षमता की आवश्यकता होगी ताकि भारत की ८ प्रतिशत की आर्थिक विकास दर को बनाये रखा जा सके. ऐसे में कोयले की आवश्यक आपूर्ति एक महत्वपूर्ण चुनौती है क्योंकि कोल इंडिया का भारत में कोयले के खदानों एवं खनन पर लगभग एकाधिकार है और निरंतर बढ़ती मांग को पूरा करने में वह असमर्थ रहा है. बारहवीं पंचवर्षीय योजना में सरकार सौ गीगावाट की बिजली परियोजना लगाने की महत्वकांक्षी योजना बना रही है परन्तु चुनौतियाँ भी अत्यंत कठिन एवं व्यापक हैं.

चुनौतियाँ: डगर इतना आसान भी नहीं
१. भूमि अधिग्रहण- यह सबसे बड़ी समस्या बनकर उभरा है. किसी भी उपक्रम या सयंत्र को लगाने के लिए भूमि की आवश्यकता होती है. और ऐसी भूमि की प्रायः मांग वहीँ होती हैं जहां घनी आबादी है अथवा जमीं कृषक कार्यों में उपयोग में लायी जाती है. कृषक उचित मूल्य और उनकी आर्थिक विकास में भागीदारी सुनिश्चित करने के बावजूद भी भूमि अधिग्रहण का विरोध करते हैं. संगूर और नोएडा में हम देख चुके हैं. इसके अलावा उनका भली भांति विस्थापन एक बहुत बड़ी चुनौती होती है. अन्यथा कृषक भूमिहीन श्रमिक बनकर रह जाता है. वोट बैंक के चलते राजनैतिक रूप से यह मुद्दा इतना संवेदनशील हो जाता है कि कार्पोरेट क्षेत्र सरकार से हस्तक्षेप की अपेक्षा करता है और सरकार इससे पल्ला झाड लेना चाहती है. कोल इंडिया के अनुसार खनन समस्या नहीं है लेकिन उसे खुली जगह चाहिए ताकि कोयले को खदान से खनन के पश्चात वहां रखा जा सके.

२. कोयले की आपूर्ति- तेजी से बढ़ते बिजली उत्पादन क्षमता और कोयले की मांग के बावजूद, कोल इंडिया के खनन की गति और उत्पादन दर स्थिर रही है. इसके अलावा इसके अधिकतर कोल रिजर्व्स माओवादी क्षेत्र में हैं जहाँ खनन कार्य अत्यंत चुनौतीपूर्ण होता है. और तो और कोयला माफिया द्वारा बड़े स्तर पर कोयले की चोरी, कर्मचारियों के मिलीभगत से पनपा भ्रष्टाचार भी समस्या को बढ़ा देता है. इससे त्रस्त कई निजी क्षेत्र की कंपनिया कोयले का आयात करतीं हैं और पिछले छह वर्षों में करीब ३४,००० करोड़ रुपये आस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया और अफ्रीका में कोयले के खदान खरीदने में निवेश किये जा चुके हैं. चूँकि आयातित कोयले की गुणवत्ता क्ष्रेष्ट होती है उनकी कीमतें भी लगभग चार गुनी अधिक होती हैं. चीन से बढती मांग से कीमतों में और उछाल आ जाता है. इसके अलावा, कुछ देश बढती हुई मांग को हतोत्साहित करने के लिए करों में वृद्धि तथा विदेशी निवेश की सीमा निर्धारित करने जैसे कदम भी उठा देते हैं. लेकिन सबसे गंभीर प्रश्न यह है क्या हम सिर्फ आयातित कोयले पर आश्रित रह सकते हैं? बारहवीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक घरेलू कोयले से केवल ७० प्रतिशत मांग की ही आपूर्ति हो सकती है. तो शेष दो सौ पचास मिलियन टन से अधिक कोयले की मांग, जो कि वर्तमान आयात का पांच गुना है, की आपूर्ति केवल आयात से करना निःसंदेह ही मुश्किल है.

३. वितरण कंपनियों का बढ़ता घाटा- ज्यादातर बिजली का वितरण राज्यों के बिजली बोर्डों द्वारा होता है और अधिकांशतः अपार घाटे में चल रहीं हैं. उनके घाटे का सबसे प्रमुख कारण बढ़ता लागत और वसूली के बीच का अंतर है. बढ़ते उत्पादन लागत, विशेष रूप से कोयले की लागत के कारण, वितरण कंपनियों को मह्गीं बिजली खरीदनी पड़ती है.जबकि भारी राजनैतिक दबाव की वजह से उनपर टैरिफ न बढाने का अत्यंत दबाव होता है. इसके अलावा, राज्य उनको देय सब्सिडी के भुगतान में भी बहुत देरी करते हैं. २००९-१० में राज्यों ने मात्र ५६ प्रतिशत ही सब्सिडी रिलीज़ किया. बिजली कंपनियों का घाटा २००७-०८ के ३१,९१० करोड़ रूपये से बढ़कर २००९-१० में ६३,५४८ करोड़ रूपये हो गया.यही हाल रहा तो अनुमान है कि यह वर्ष २०१५ तक १५०,००० करोड़ हो जायेगा. उनकी बिगड़ती आर्थिक स्थिति के कारण वे बिजली खरीदना बंद कर देती हैं और लोड शेडिंग यानी बिजली की कटौती करना शुरू कर देती हैं ताकि उनका घाटा कुछ कम हो सके. और जब तक कोई चुनाव सन्मुख न हो, राज्य सरकारों का भी उन पर कोई विशेष दबाव नहीं होता.

४. बिजली चोरी- बिजली की चोरी अत्यंत गंभीर समस्या रही है. भारत में तक़रीबन ४० प्रतिशत बिजली चोरी हो जाती रही है. यद्दपि इसे रोकने के प्रयास हो रहे हैं. आर- एपी डी आर पी योजना के तहत वितरण कंपनियों को उनके ऐ टी एंड सी घाटों को १५ प्रतिशत तक लाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है जिसमें कुछ सफलता भी मिल रही है.आपके प्रदेश सहित अन्य राज्यों जैसे छत्तीसगढ़, ओडिशा, उत्तराखंड, राजस्थान और पश्चिम बंगाल में ३०-४० प्रतिशत की चोरी हो जाती है जबकि मध्य प्रदेश में ४०% से भी ज्यादा. दिल्ली, गुजरात, महाराष्ट्र, असाम, कर्णाटक और हरियाणा इसे २०-३० प्रतिशत तक लाने में सफल रहे हैं जबकि आंध्र प्रदेश में सबसे कम बिजली चोरी होती है यानी २०% से भी कम.

५. अन्य समस्याएं- हालांकि कुछेक राज्यों ने टैरिफ बढाया है लेकिन वह नाकाफी है. बिजली कंपनियों का बढ़ता आर्थिक संकट शीघ्र ही उन्हें लील लेगा यदि कोई कारगर ठोस कदम नहीं उठाया गया. इसके लिए बहुत आवश्यक है कि इसमें राजनितिक हस्तक्षेप बंद किया जाय, वितरण कंपनियों का निजीकरण किया जाय तथा टैरिफ वृद्धि में पर्याप्त पारदर्शिता एवं नियमितता लायी जाय. इसके अलावा, राज्य बिजली बोर्डों के बढ़ते घाटे के कारण एक तो वे मह्गीं बिजली नहीं खरीद पाते, बैंक उन्हें ऋण देने से कतराते हैं तथा वे अपने उपक्रमों एवं सयंत्रों का विस्तार और आधुनिकीकरण करने में असमर्थ होते हैं. इस प्रकार विकास के नाम पर अन्धाधुन खनन से पर्यावरण तो प्रभावित होता ही है पारिस्थितिक तंत्र भी बिगड़ता है.

अंधकारमय भविष्य
अब तक आपको समझ आ गया होगा कि चौबीसों घंटे बिजली आपूर्ति लगभग असंभव है. आये दिन होनेवाले चुनावों में राजनैतिक पार्टियां मुफ्त बिजली की घोषणाएं करती हैं. यह न सिर्फ गैर जिम्मेदाराना है बल्कि इससे राज्य सरकारों के कोषों पर भारी दबाव पड़ता है तथा वितरण कंपनियों के लिए प्राणघातक सिद्ध होता है. अपने प्रदेश में अनेक गरीब किसान बिजली के अभाव में महगें डीजल जेनेरेटरों के प्रयोग पर विवश हैं. यदि उन्हें थोड़ी महगीं दरों पर भी बिजली मिले तो उन्हें विशेष आपत्ति नहीं होनी चाहिए. समय आ गया है जब राजनैतिक पार्टियां अपनी छदम स्वार्थों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित में सोचें. आखिर, थोड़े से अल्पकालिक लाभों के लिए दीर्घकालिक क्षतियों की अवहेलना नहीं की जा सकती. एक जिम्मेदार नागरिक के तौर हमारी भी कुछ जिम्मेदारियां हैं. आइये, बिजली बचाकर और बिजली चोरी को रोककर राष्ट्र की प्रगति अपना अमूल्य योगदान दें.

Sunday, November 14, 2010

कहत कबीर सुनो भाई साधो!!

ज़िन्दगी के जब कुछ अहम् फलसफों को, गूढ़ से गूढ़ बातों को सामान्य जनता की सरल भाषा में कहने की बात चले तो संत कबीर का नाम सर्वप्रथम आता है. आज भी जब मैं उन्हें पढ़ता हूँ तो बड़ा ही आश्चर्य होता है कि वे लगभग पांच सौ साल बाद भी कितने प्रासंगिक हैं. उनके कुछ चुनिन्दा दोहों को यहाँ प्रस्तुत करते हुए मुझे अपार प्रसन्नता हो रही है. आशा है इक्कीसवीं सदी की इस भागम भाग, रेलम पेल ज़िन्दगी जीने वाली डिस्को पीढी को भी कबीर के दोहे ना सिर्फ पसंद आयेगे अपितु झकझोरेगें भी. वावजूद इसके की कि ये रचनाएँ हिंदी भाषा के प्रादुर्भाव के शताब्दियों पूर्व के हैं, इनके मायने आसानी से समझ में आते हैं.


तिनका कबहूँ ना निंदिये, पाँव तले जो होय
कबहूँ उड़ आँखों पड़े, पीर घनेरी होय.

दुःख में सुमिरन सब करें, सुख में करे ना कोय
जो सुख में सुमिरन करे, दुःख काहे को होय.

माला फेरत जुग भया, फिर न मन का फेर
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर.

साई इतना दीजिये, जामें कुटुम समाय
मैं भी भूखा न रहूँ, साधू ना भूखा जाय.

लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट
पाछे फिर पछताओगे, प्राण जाहीं जब छूट.

पांच पहर धंधे गया, तीन पहर गया सोय
एक पहर हरि नाम बिनु, मुक्ती कैसे होय.

धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आये फल होय.

क्षमा बडन को चाहिए, छोटन को उत्पात
कहा विष्णु कौ घट गयो, जो भृगु मारी लात.

माटी कहे कुम्हार से, तू क्यों रौंदे मोय
इक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय.

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब
पल में प्रलय होयगी, बहुरि करेगा कब.

जो तोकू काँटा बुवे, ताहि बोय तू फूल
तोकूं फूल के फूल हैं, वाकूं हैं त्रिशूल.

दुर्बल को ना सताइए, जाकी मोटी हाय
बिना जीव की सांस सों, लोह भस्म हो जाय.

आया था किस काम को, तू सोया चादर तान
सूरत संभल ऐ गाफिल, अपना आपा पहचान.

ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय
औरन को शीतल करे, आपु शीतल होय.

Saturday, July 3, 2010

झूठी कहानियां

बचपन की कई कहानियां कभी कभी अनायास याद आ जाती हैं. और लगता है कितनी अवास्तविक होती थीं वो. आज बारिश में भींगते कौओं ने याद दिलाई कौए और गिलहरी की कहानी. किसने कहा कौए मेहनत नहीं करते? कामचोर होते हैं? अपनी आँखों से देखा उन बिन रेनकोट के भींगते, कांपते कौओं को जो बुरी तरह थरथरा रहे थे लेकिन फिर भी घुटने भर पानी में खाना तलाश रहे थे. वक़्त तो नहीं बदल गया? कहीं कौओं ने मेहनत करना तो नहीं सीख लिया? मजबूरी में लोग क्या क्या नहीं करते हैं?

कछुए और खरगोश की कहानी भी बस कमजोर को दिलासा देने के लिए ही लिखी गयी थी. कछुआ कुछ भी कर ले खरगोश से बाज़ी जीतना नामुमकिन ही है. अगर एक बार गलती हो भी गयी तो कोई बार बार ऐसी गलती थोड़े नहीं करेगा. दुनिया की रफ़्तार रोज ही बढ़ती जा रही है, ऐसे में बेचारे कछुए ऐसे भ्रम पाले बैठे रहें. आज परीक्षा में ९५ फ़ीसदी लानेवाले भी फिसड्डी साबित हो रहे हैं तो महज पास भर होने वाले क्या उखाड़ लेंगे भला? आज कल तो भैय्या ज़माना उलटा हो गया है. गीदड़ भभकी देने वाले माल उड़ा ले जाते हैं जबकि शेरों ने मिमियाना सीख लिया है. मायने बदल रहे हैं, मानदंड बदल रहे हैं. हम कब बच्चों को झूठी कहानियाँ सुना सुना कर उन्हें अँधेरे में रक्खेंगे? यह "गूगल" का दौर है और कोई भी जानकारी बस चुटकी में मिल जाती है. बच्चे बल्कि हमसे ज्यादा स्मार्ट हो गए हैं. वक़्त आ गया है जब उन्हें कहें "बेटा सच, बोलना ठीक बात है लेकिन अगर उससे काम बिगड़ता हो तो वह बेवकूफी है". अब जब बच्चे अडल्ट फिल्में देखने और समझने भी लगे हैं तो कुत्ते बिल्ली, राजे रानियों के पुराने किस्से सुनाने से क्या फायदा?