Friday, December 11, 2009

लल्लन भाई

रास्ते में भीड़ देखा तो रिक्शेवाले ने कहा ज़रा देखते हैं माजरा क्या है. पता चला रानी मुखर्जी अपने किसी फिल्म के प्रचार के लिए तमाशे कर रही है. फिर मुझे लल्लन भाई की याद आ गयी. रानी उनकी पसंदीदा हीरोईन है. मैंने सोचा परदे पर इतनी हसीं दिखने वाली रानी वास्तव में इतनी कुरूप होगी लल्लन भाई ने शायद कल्पना भी ना की होगी. खैर. लल्लन भाई को हीरोईने तो पसंद हैं मगर सबसे स्मार्ट हीरो वो खुद को ही समझते हैं. एक दिन सलमान खान साहब आस पास पधारे तो मैंने छेड़ा "देखने नहीं गए?" बस बरस पड़े. "क्यूँ जाऊं?" मैंने कहा बहुत बड़े अभिनेता हैं. तो बड़ा टेड़ा जबाब मिला. "होंगें. होंगे बड़े अभिनेता अपने घर में, मुझे क्या? और बड़े किस ओर से भला? क्या वो चबा चबा कर नहीं खाते? या खड़े खड़े ही टट्टी करते हैं?"

भाई लल्लन भाई का कोई जबाब नहीं. दूध में मिश्री घोलकर पिलाते हैं. जबाब देने में उनका कोई सानी नहीं. मैंने एक दिन पूछा कि कैसे हो तो जबाब मिला " पहले घर में मच्छर थे, अब बीवी है." (दोनों खून चूस लेते हैं).

Thursday, December 10, 2009

विक्षिप्त लोग

बात उन दिनों की है जब हमारे अनुज (छोटे भाई) हास्टल में रहा करते थे. चूँकि वे फर्स्ट इयर में थे हर चीज़ में उनका नंबर बाद में आता था. मसलन अखबार पढने का पहला अधिकार सुपर सीनियर्स, फिर सीनियर्स का होता था. इनका नंबर सबसे बाद में आता था. जिस दिन कोई मसालेदार खबर होती तो अखबार नसीब ही नहीं होता था और जिस किसी दिन कोई गरमा गरम खबर नहीं होती, मिनटों में अखबार इनके बिस्तर पर आ जाती. अब आप सोचेंगे कि यह कैसी खबरें हैं तो एक नमूना पेश है:

* नाबालिग छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार
* मामा के साथ युवती फरार
* पिता ने किया पुत्री के साथ दुष्कर्म
* प्रेमिका ने प्रेमी से मिलकर की पति की हत्या


ये अखबार वाले भी जानते हैं कि लोग चाहते क्या हैं. इसलिए ऐसी ख़बरों को पूरे विस्तार से छापते हैं. जितना ही 'डीटेल" होगा खबर उतनी ही हिट होगी. बात छोटी नहीं है. यह एक बहुत बड़े वर्ग की दास्ताँ है जो हमारे इसी सभ्य समाज में कहीं छुपे हुए हैं. इस विक्षिप्त मानसिकता का एक और उदहारण है- फिल्मों में बलात्कार के सीन आने पर लोगों द्वारा सीटी बजाना. वैसे वही लोग हीरो के इंट्री और विलेन की धुनाई पर भी सीटी बजाते हैं. आपने कभी सोचा है कि फिल्मों में बलात्कार के दृश्य क्यूँ अनिवार्य थे कभी? अब यह बी, सी ग्रेड की फिल्मों तक ही सिमट गया है. तो क्या हम पहले से ज्यादा सभ्य हो गए हैं? लेकिन बलात्कार तो अब भी होते हैं. क्या यह उस मानसिकता की उपज है जहां हम दूसरों के दुःख में सुख तलाशते हैं?

Friday, October 16, 2009

शुभ दीपावली

प्रिय मित्र गण,
प्रकाश के इस अनूठे और अलौकिक पर्व, दीपावली पर समस्त मित्रों को हार्दिक शुभकामनाएं. ईश्वर आप सब की मनोकामनाएं पूर्ण करें.

सस्नेह आपका,
दीपक

Thursday, October 8, 2009

अगर मैं लड़की होता

अगर मैं लड़की होता तो क्या होता? अव्वल तो मुझे नौकरी जैसी चीज़ नहीं करनी पड़ती. करता भी तो शौकिया. घर बैठे ऐश करता. हज़ार पीछे घूमते, कितने आह भरते. आनलाईन होता तो सैकडो मक्खी की तरह चैट करने के लिए चिपक जाते. बॉस कभी अकड़ कर बात नहीं करता, पगार जल्दी जल्दी बढती; प्रमोशन फ़टाफ़ट मिलता. पालिटिक्स में भी औरतों के लिए अच्छा खासा स्कोप होता है.

मिस वर्ल्ड बनकर फिल्मों में उतरता. रातों रात किस्मत बुलंद हो जाती. जिनको छू देता, तर जाते. लटके झटके दिखा कर टी वी शो तो कर ही लेता. लोग पार्टियों में बुलाते. हीरोईन नहीं तो बिकनी पहन कर आईटम नंबर तो कर ही लेता. कुछ नहीं तो चीयरलीडर्स में अच्छी आमदनी हो जाती. थोडी उम्र ढलने लगती तो किसी बिजनेसमैन को पटा लेता ताकि बुढापा आराम से कट सके. 'एन आर आई' वाला आप्शन तो हमेशा खुला है. मैं लड़की होता तो कोई मामूली लड़की थोड़े होता. आप जानते हैं मेरा मतलब. कितने उद्योगपति और नेतागण ऐसी जानलेवा अदाओं के शिकार हुए हैं.

दो लाख लोग रोज़ मेरा प्रोफाईल निहारते. मीठी मीठी बातें लिखते. अपना दिल स्कैन करके भेजते रहते. हाल चाल लेने और गिफ्ट देने वालों का तांता लगा रहता. आसानी से कारों में लिफ्ट मिल जाती. अभी दो चार लोग मेरे ब्लॉग पर कमेन्ट लिखते हैं, तब हज़ार लोग लिखते. शादी हो जाती तो पति चू **** की तरह काम करता और मैं किटी पार्टियां आयोजित करता. नए नए शौक़ होते मसलन 'इंटीरियर डिजायनिंग' पेंटिंग्स खरीदना वगैरह. अगर किस्मत वहाँ भी साथ नहीं देती तो किसी फ़िल्मी हीरो के घर में 'कामवाली' की नौकरी का बेहतरीन विकल्प तो है ही.

मेरे बड़े भाई साहब आज भी ताना मारते हैं कि मैं एक लड़की नहीं पटा सका. तब ऐसे जहर बुझे ताने तो नहीं सहने पड़ते!!

Wednesday, October 7, 2009

दीवाली की शुभकामनायें

दीवाली आ रही है. खूब बम फूटेंगे शोर शराबे मचाने के बाद लोग और भी शोर मचाएंगे जब तक गले में कैंसर ना हो जाए. घर का सारा कचरा सड़क पर रखा जाएगा ताकि लक्ष्मी आकर घर नोटों से भर दें. ताकि जुआ खेला जा सके. दारु पिया जा सके. भाई, एक बात बताओ. अगर सारा माल लक्ष्मी ही रखती हैं तो मुसलमानों को पैसा कौन देता है? शायद दूर से वह देख नहीं पाती होंगी कि सामने वाले का मज़हब क्या है. वैसे मुसलमान भी 'बड़ी दीवाली' मनाते हैं, पूरे साल. हम एक बार मनाते हैं वे आये दिन कहीं ना कहीं मनाते रहते हैं. हम छोटे- छोटे पटाखे फोड़ते हैं उनसे कहाँ मुकाबला?

हिन्दू मानते हैं कि शेषनाग ने पृथ्वी को अपने फन पर उठा रक्खा है. बड़ी नाइंसाफी है. मुसलमानों और इसाईओं का बोझ अपने सर पर क्यूँ ढोते फिर रहे हैं? झटक क्यूँ नहीं देते इन सबों को? हिन्दुओं के पूजा करने का क्या फायदा? खैर, हम लक्ष्मी की बात कर रहे थे जिनके पास खूब माल है. लेकिन घर नहीं. बेचारी क्षीर सागर में खुले आसमान के नीचे रहती हैं. कुछ- कुछ बिहार के बाढ़ग्रस्त इलाकों में रहने वालों के जैसे. और अपने भोले नाथ भी तो कैलाश पर्वत की चोटियों पर अकेले अकेले भंग खाए मदहोश पड़े रहते हैं.

अरे! कोई उन्हें जगाओ भाई.

Thursday, September 24, 2009

आदमी और कुत्ता

मेरी गली में चार पांच कुत्ते रहते हैं जिन्हें मैं रोज़ बिस्किट खिलाता हूँ. और लोग भी खिलाते हैं लेकिन मैं जितना खिलाता हूँ वो हमेशा खाने को तैयार बैठे रहते हैं. गोया उनका पेट कभी भरता ही ना हो. सब आपस में इस बात की प्रतियोगिता करते हैं कि कौन सबसे ज्यादा दुम हिला सकता है. एक कुत्ते को मैंने देखा है. वो बाकी कुत्तों पर धौंस जमाने की कोशिश करता है और मुझे यह जताने की कोशिश करता है कि वो सबसे ज्यादा वफादार है. ताकि वो सबसे ज्यादा दुम हिलाने का श्रेय पा सके और सबसे ज्यादा बिस्किट खा सके. कुछ दिन मैंने बिस्किट खिलाना बंद करके भी देखा. उन्होंने मेरी ओर देखना भी बंद कर दिया. शायद उन्हें लगा हो कि मैं अब किसी काम का नहीं रहा.

अजीब बात है कि कुत्तों में भी इंसानी आदतें पनप रही है.

Tuesday, September 22, 2009

डूड

आजकल 'डूड' कहने और कहलाने का चलन है. लड़कियां 'बेब' कहलाना पसंद करती हैं. एक समय था जब लड़कियों के नाम के आगे 'देवी' लगाकर सम्मान दिया जाता था. अब किसी को जरा देवी कह कर तो देखो. शहर में रहकर थोडा शहरीकरण हो गया है. वरना अभी भी मन से देहाती ही हूँ. गाँव वाले 'बम्बईया' कहते हैं और यहाँ के लोग 'देहाती' समझते हैं. ना गोंद लगाकर बालों को कौए का घोंसला बनाकर घूमता हूँ. ना टट्टू बनवाया कभी. कैफे काफी डे में बैठकर बेकार में ना गुफ्तगू करता हूँ. ना तो किसी दारू का नाम पता है. ना किसी क्लब का कभी मुंह देखा. ना इत्रों का शौक़ है. ना सरकता जींस पहनता हूँ ताकि किस ब्रांड का अंडर वीयर पहना है लोग मालूम कर लें.

यह बात समझ में क्यूँ नहीं आती की आधुनिकता विचारों से आती है. चमाचम जूते और अच्छे कपडे पहन लेने से मन का विकास नहीं होता. लेकिन अब इन्हें कौन समझाए? 'आई फोन' वाला साधारण फोन वाले को तुच्छ समझता है. 'मर्सीडीज़' वाला 'मारुती' वाले को पिछडा समझता है. अब अमरीकी संस्कार हमारे बच्चों में प्रतिस्फूटित हो रहे हैं तो आगे स्तिथि कितनी भयावह होगी इसकी परिकल्पना मैं नहीं करना चाहता. लेकिन इतना तय है की एक दिन आएगा जब अमरीकी हमें योग सीखाएँगे, गीता और रामायण का पाठ कराएँगे. और हम उनसे सीखेंगे की सुख पूर्वक कैसे जीया जाता है.

सादगी का जमाना ही नहीं रहा. अब यह सब गंवारपन लगता है.